Thursday, June 14, 2007

सावन आ रहा है...क्या आप स्वागत के लिये तैयार हैं ?

समझ लीजिये कि अब बरस ही गये हैं बादल।मेरे वतन मालवा में मेघ बरसते देखने का अलग ही सुख है।बस फ़र्क़ इतना भर है कि बरसती बारिश में सड़क पर निकलने वाले नज़र नहीं आते अब.एक तो कार वाले बहुत हो गये हैं.मेरे छोटे से शहर (मुंबई-दिल्ली-चैन्ने की तुलना में)इन्दौर में भी सुना है छोटी-बडी़ सात लाख कारें हो गयी हैं.अभी जब ये ब्लाग लिख रहा हूं तो मेरे कमरे की खिड़की के सायबान पर बारिश की बूंदो की टप-टप शुरू हो गई है.

ये आवाज़ें कान में आते ही मुझे अपने दादाजी की याद याद आने लगी है जो अब इस दुनिया में नहीं हैं . वे रह्ते तो थे सैलाना में जो रतलाम जंक्शन से बीस कि.मी.दूर बसी एक प्यारी सी रियासत थी.वे संगीत और खा़सकर क्लासिकल मौसीकी़ में बहुत निष्णांत थे.आसमान में बादलों की घिरावट शुरू होते ही उनका गुनगुनाना शुरू हो जाता आए री बदरा..मोतियन लारा(साथ) लाए...गाओ री मंगल आए री बदरा.इसी आलम में वे मेरी दादी के ज़रिये मेरी मां से भजियों की फ़रमाइश भी कर डालते और इस बहाने हम बच्चों को भी मौसमी व्यंजन का आनन्द मिल जाता.इस मामले आप मुझसे सहमत होंगे कि जो मज़े आपने - मैने अपने बचपन में लिये खानेपीने के वे आजकल के रेडीमेड कल्चर में कहां ? कुरकुरे और अंकल चिप्स खाने वाली पीढी़ उस मज़े से निश्चित ही मरहूम है मो गुज़रे दौर के शान हुआ करते थी.

हां तो मै दादाजी के गायन की बात कर रहा था....उनकी गाई एक और बंदिश याद आ गई....नन्ही नन्ही बूंदन मेहा बरसे...मल्हार के रागों में बंधी ये बंदिशें मन को झकझोर देतीं थी.हां रफ़ी साहब और आशाजी का गाया वह गीत भी तो याद आ गया सावन आए या न आए ..जिया जब झूमें
सावन है...
और हां लताजी और रफ़ी साहब की वो जुगलबंदी....झूले में पवन के आई बहार..(बैजूबावरा) भी याद आ गई.और याद आ गए किशोर भारत भूषण और कमसिन मीनाकुमारी..नौशाद साहब का जादू जगाता संगीत और शकील बदायूंनी के मासूम शब्द.

कु़दरत और संगीत का साथ भी कितना विचित्र है न कि बिना किसी काग़ज़ का सहारा लेकर लिखा जा रहा ये ब्लाग मानो मेरे ज़हन में यादों के हर-सिंगार बन कर झर रहा है.इन्दौर और बैजूबावरा की बात चली है तो देखिये तान - सम्राट उस्ताद अमीर ख़ां साहब भी तो याद आ गए है या यह भी कह सकता हूं कि वो हमारी यादों की महफ़िल में नमूदार हो गए हैं ..उस्ताद का गाया मेघ तो क्लासिकल मौसीकी़ की एक अनमोल धरोहर है.घनन घनन घन बरसो रे..(२) विविध भारती के सुबह साढे़ सात बजे बजने वाले लोकप्रिय कार्यक्रम संगीत सरिता की ह्स्ताक्षर धुन भी मल्हार रंग में ही डूबी हुई है.वह धुन दर-असल बहुत ही लोकप्रिय गीत गरजत बरसत सावन आयो रे..लायो न संग में हमरे बिछरे बलमवा..सखी का करूं हाय..का प्रील्यूड (गीत शुरू होने के पहले बजने वाला संगीत; जो बीच में बजे सो इंटरल्यूड) गायक स्वर हैं..सुधा मल्होत्रा और कमल बारोट के.हाय! क्या मीठी आवाज़ें हैं दोनो की ...मानो एक गुड़ तो दूसरी मिश्री.

तो मै शुरू हुआ था इस बात से कि हुज़ूर मेघराज आ रहे हैं हम सब के द्वारे तो उनका स्वागत कीजिये...भजिये बनाईये ..खाइये..घर में झूला हो तो क्या बात है...अच्छा संगीत सुन सकते हों तो ज़रूर सुनिये ..हां आपके पास पं.भीमसेन जोशी के पहाडी़ स्वर मे निबद्ध मियां की मल्हार की वो चर्चित बंदिश हो तो बरसते पानी में ज़रूर सुनिये..घूम ..अति घूम आई बदरिया..या बादरवा बरसन लागी...

सच मानिये आप पानी में बाहर आकर भिगना नहीं चाहते तो ये बंदिशें आपके मन को ज़रूर भिगो देने की ताक़त रखतीं हैं.तो मेरी बात पर इस बार ग़ौर करियेगा ..बच्चों या मित्र को लेकर बाहर निकलिये तो ..ये सावन बड़ा नखराला है ..यूं ही सबको थोड़े ही भिगोता है...मोटर-बाइक (हैल्मेट अवश्य साथ लीजियेगा) हो तो वह उठा लीजिये और कार हो तो उसे लेकर निकल लीजिये...देखिये तो सही क़ुदरत किस तरह मालामाल है और आपको भी तो करना चाहती है..होली पर गाते हैं न ..फ़ागुन के दिन चार रे ..होली खेल मना रे..अब इसे यूं भी गाया जा सकता है..सावन के दिन चार रे ..सावन खेल मना रे...भीगते हुए कैसा लगा मुझे ज़रूर बताइयेगा...मै तो चला भई ..मेरे हिस्से के भजिये कहीं ख़त्म न हो जाएं.

आप जावेद अख़्तर साहब और ए.आर.रहमान की संगीतमय कारीगरी और आमिर खा़न की खूबसूरत तस्वीर के बरसात में नहाये गीत...घनन घनन घिर आए बदरा का आनंद लीजिये.





4 comments:

Suresh Chiplunkar said...

हम तो तैयार हैं संजय भाई, भजिये लेकर भी और संगीत लेकर भी... तेजी से बढते कंक्रीट के जंगल प्यारे-प्यारे जंगलों पर भारी पड़ रहे हैं और हरेक घर, ओटले और बगीचे के चारों ओर सीमेंटीकरण भी मुँह चिढा रहा है, पानी आता है और आकर हाथों से फ़िसल जाता है... ये अधिक चिन्ता का विषय है...फ़िर भी सावन के स्वागत में कोई कोताही नहीं बरती जायेगी.. खुश आमदीद..

Raviratlami said...

सामयिक प्रविष्टि है. कल शाम को जब आंधी चली तो मैं भी निकल पड़ा - धूल गुबार और बारिश की पहली छींटों को महसूस करने. सचमुच बड़ा आनंद आया.

Atul Sharma said...

संजय भैया ये मेरे लिए बड़े दु:ख की बात है कि आप अप्रेल से लिख रहे हैं और मुझे अब पता चल रहा है। मुझे खुशी है कि आप मालवा क्षेत्र के बारे में बहुत ही अच्छी प्रस्तुतियाँ दे सकेंगे।
थोड़े से भजिए मेरे लिए भी रखियेगा :)
http://malwa.wordpress.com

Lavanyam -Antarman said...

मालवा के सँजय भाई,
आपने तो 'मालव प्रदेश ' की बरखा के साथ बहोत सारे उम्दा गीतोँ की याद दीला दी -
और उपर से आपके दादा जी का जिक्र और क्लासिकल बँदीशोँ का गुनगुनाना आँखोँ के आगे सजीव हो उठा !
बहुत ही बढिया लिखा है --
बारीश के जीवनदायी जल से तृप्ति मिले ये मेरी भी सद्`इच्छा है -
और हाँ, युनूस भाई के ब्लोग पे मेरे बारे मेँ लिखा है वो भी देखा मैँने -
आपको ये बहन की याद आयी -- धन्यवाद !
अमेरीका मेँ रहूँ या भारत मेँ ~`
मेरी माटी तो मेरे भारत की ही रहेगी ना !:)
"जिस विधि चाहे ,राम गुँसाई
, उस विधि ही रह लैइये रे मनवा,
राम, भजन ..सुख लैइये...
( ये एक पँक्ति, मेरे लिखे भजन से आप को सादर, अर्पित है )
स ~ स्नेह,
- लावण्या