Thursday, October 11, 2007

क्या कल से आपकी बेटी भी गरबा खेलने जाने वाली है


आपको आपकी बिटिया पर पूरा भरोसा है और वह है भी दबंग लेकिन अब ज़माना भलमनसात का रहा नहीं जनाब।हो सकता है आपको मेरे ख़याल थोड़े दकियानूसी जान पड़ें।सच जान लें कि नवरात्र का आराधना पर्व और उसके साथ जुड़ा गुजरात का विश्व-विख्यात गरबा अब सभ्रांत परिवारों और गरिमामय और युवक-युवतियों का दस दिवसीय जमावड़ा अब आपराधिक गतिविधियों का केन्द्र बनता जा रहा है। कॉलोनियों और गली-मोहल्लों की धूम के पीछे अब कुछ ऐसे कुचक्र भी चल पड़े हैं जो हमारे घर की बहन-बेटियों को मुश्किल में डाल देते हैं। देर रात चलने वाले इस उत्सव में हमारे घर की बच्चियाँ अनंत उल्लास से शिरकत करतीं हैं । मैं चाहूँगा कि यदि आपके घर की बहनें,बच्चियाँ और महिलाएँ इस बार गरबा करने जा रहीं हो तो कुछ बातों का विशेष ख़याल रखें :


-महंगे और असली आभूषण पहन कर न जाएँ।


-मेक-अप वैसा ही करें जो आपको सुन्दर ज़रूर दिखाए...उत्तेजक नहीं .


-जिसके साथ गरबा करने जा रहे हों उस मित्र का मोबाइल या फ़ोन नम्बर ज़रूर घर पर नोट करवाए।


-कार की चाबी,घर की चाबी , अपना मोबाइल और पर्स यदि साथ है तो गरबा खेलते समय किसी विश्वस्त परिचित के पास यह सामग्री छोड़ दे।


-अपरिचित युवकों से सतर्कता से पेश आएँ। नाहक ही किसी से बोल-व्यवहार न बढ़ाए।


-देर रात को घर जब लौट रहे हों तब अपना वाहन धीमी गति से चलाएँ।


माँ दुर्गा से कामना करता हूँ कि आपके परिवार के लिये ये नवरात्र उत्सव आनंदमय हो।

आप भी गरबा करें लेकिन यदि अपने घर की बहू-बेटियाँ अकेले जा रहीं हो तो उपर लिखी बातों पर ज़रूर ग़ौर करे।आस्था , संस्कृति और परंपरा का यह पावन पर्व दर-असल अब अपनी लोक समवेदनाओं के परे जाकर नैन-मटक्का ज़्यादा बनता जा रहा है। इसमें छुपी भक्ति-भावना और परस्पर समभाव की अभिव्यक्ति समूल से नष्ट होती जा रही है । मेरा काम था चेताना...परेशानी से सतर्कता भली...थोड़ी लिखी ....पूरी जानना...जय माता दी.


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6 comments:

Sanjeet Tripathi said...

बहुत सही!!
नवभारत रायपुर मे रहने के दौरान इस पर एक लंबा शोध सा कर चुका हूं, एक से एक बातें जानने को मिली थी!!

हर्षवर्धन said...

सलीके से आपने गरबा खेलने जाने वाली लड़कियों के मां-बाप को सावधान किया है। मैंने पिछले साल मीडिया में गरबा के बहाने अश्लील कृत्यों की जो दास्तान सुनी है वो, किसी को भी गरबा से डरा सकती है।

एक पंक्ति said...

नवरात्र पर्व नहीं धंधा बन गया है इवेंट मैनेजर्स के लिये.सोने की अंडा देने वाली मुर्गी सा. अब अख़बार भी अपना मूल काम भूलभाल कर गरबे आयोजित कर रहे हैं.इनके कर्ताधर्ता कहते हैं कि हम नवरात्र के बहाने वहाँ मौजूद जनसमुदाय में अपने प्रॉडक्ट (लीजिये मालिक ! अख़बार भी प्रॉडक्ट हो गए )को आसानी से प्रमोट करते हैं.

गरबे में नैन-मटक्के की बात बिलकुल ठीक है.मज़ा ये है कि गरबे की धूम गुजरात से ज़्यादा दीगर प्रदेशों में नज़र आने लगी है . एकाएक लोक-संस्कृति का सैंसेक्स ऊपर की ओर जा रहा है बीडु !
माताजी तो खाली पीली बहाना है ...असल में नानसेंस को भुनाना है.

Udan Tashtari said...

बहुत आभार इस सामायिक समझाईशी पोस्ट के लिये, साधुवाद.

जय माता दी.

जोगलिखी संजय पटेल की said...

आभार आप सबका.
हिम्मत मिली आपके साथ होने से.
संजीत भाई - हर्ष भाई अपने अनुभवों को कभी अपने ब्लॉग पर साझा करिये न ! एक पंक्ति में नानसेंस को भुनाने वाली बात ठीक लगी.समीर भाई तत्परता से मिली आपकी टिप्पणी जज़्बा देती है लिखते रहने का. नवरात्र के ये नौ दिन मन की पावनता,विचारों की शुध्दता और कर्म की सात्विकता के रहें....आमीन.

मीनाक्षी said...

सावधान सिर्फ लड़कियो के माता-पिता नही होते.. लड़के के माता-पिता पर मेरे विचार मे और अधिक जिम्मेदारी आ जाती है. मेरे दो बेटे है और मुझे लगता है कि नारी के हर रिश्ते को आदर देना उन्हे आए... हमेशा ख्याल रखना पड़ता है.