Wednesday, August 15, 2007

बहुत सुस्त था मेरे शहर का मंज़र...आपके ?

रोज़मर्रा सा ही था दिन आज का।कुछ ने सो कर गुज़ारा ... किसी ने खा पी कर लिया मज़ा...कोई था थका हारा....कोई फ़िल्म देखता रहा...कोई मिठाई बेचता रहा...कोई आप और मेरे जैसा था जो ब्लाँग लिखता रहा...किसी ने झंडा चढा़ किसी ने शाम को उतारा....साठ के हो जाने की कहीं कोई खुशी नज़र नही आई...सड़कों पर सुस्त दिखे बहन भाई....रोज़ी के लिये सब्ज़ी बेचती बूढ़ी माई...बदस्तूर जारी था मेरे शहर में गाडियों का कारवाँ...फ़िर हो गए लाल क़िले से कुछ नये वादे...देखते रहें आप और हम क्या हैं नेताओं के इरादे...कवियों ने लिखी देश के सूरते हाल की कविताएं...जिन्होनें देखा था सन सैंतालीस का पन्द्रह अगस्त वे सोचते रहे अब किससे क्या बतियाएँ...चलो रोटी खाओ...रात हो गई...आप और मै भी सो जाएँ...मन गया आज़ादी का जश्न...मन गई छुट्टी...कल से फ़िर काम पर लग जाएँ.

3 comments:

अनिल रघुराज said...

चलो काम पर लग जाएं। सहज अभिव्यक्ति है। लेकिन कुछ तो बदल रहा है। काश उसकी कुंजी पकड़ में आ जाती तो कोई नया कारवां चल निकलता जो अपने ही देश में राष्ट्र से निर्वासित लोगों की जिंदगी संवारने का सबब जाता।

vimal verma said...

तो ये दिन भी गया.. चलिये अब कुछ और किया जाय ...जो हमारी आपकी जिन्दगी में रस घोल दे.. लिखा आपने सटीक है... लिखते रहें

परमजीत बाली said...

अब आपने जो भी लिखा...हमने पढ लिया...आप अब सोने जा रहे हो ..हम से मत पूछना क्यूँ अगले दिन टिपिया रहे हो...:(