Saturday, July 12, 2008

अब ढूँढे न मिलेगी ऐसी संजीदगी.

कृष्णचंद्र शुक्ल एक नेक दिल, सादा तबियत इंसान.ज़बरदस्त स्वाध्यायी.
लायब्रेरी में जाकर देश के तमाम अंग्रेज़ी-हिन्दी अख़बार पढ़ डालते.मेडीकल
काँलेज इन्दौर में कार्यरत थे.पिछले बरस गुज़र गए. आज अनायास याद आ गए.
किसी भी सामयिक विषय पर उनके सैकड़ों पत्र देश भर के अख़बारों
के संपादक के नाम पत्र स्तंभ में छपते थे.

सायकल पर चलते रहे ताज़िन्दगी,आँखों पर चश्मा,चेहरे पर दूधिया खिचड़ी
दाढ़ी.एक दिन अनायास मेरे दफ़्तर आए.अभिवादन किया मैने उनका.उम्र में
मेरे पिता से बड़े थे तो ताऊजी संबोधित करता था उनको.सलाम-दुआ के बाद
कुछ ताज़ा विषयों पर बात आ गई . मैने पूछा कैसे आना हुआ. बोले तुमने पिछले
दिनों एक पेपर भेजा था मुझे ? मैंने कहा हाँ मिल गया होगा.बोले हाँ वह तो ठीक है
लेकिन तुम्हें याद है संजय वह तुमने बुक – पोस्ट से भेजा था.मैंने कहा हाँ .
अख़बार था सो एक रूपये का टिकिट लगा कर भेजा था. शुक्ल जी बोले
तुमने उस अख़बार में एक चिट्ठी भी रख दी थी..हाँ मैने कहा..वह अख़बार
क्यों भेजा था उसके बारे में एक छोटी सी टिप्पणी थी उस स्लिप पर.
शुक्लजी बोले बुक पोस्ट का मतलब यह नहीं कि हम खुली डाक में
कुछ भी रख दें.तुमने अख़बार में एक छोटी सी स्लिप ही क्यों न रखी हो
वह नितांत ग़लत काम है.अख़बार में कोई काग़ज़ रखना था तो उसे लिफ़ाफ़े
में रखकर पाँच रूपय का टिकिट लगा कर पोस्ट करना चाहिये था.
मैंने उसी वक़्त कान पकड़े कि आज के बाद कभी ये
गुस्ताख़ी न होगी.उन्होंने कहा कि पोस्टमेन ने हालाँकि इसका नोटिस नहीं लिया
लेकिन हमें तो इस देश के एक सजग नागरिक के रूप में क़ानून-क़ायदे का
अनुसरण करना चाहिये.किसी ने देखा नहीं तो क्या ; अनैतिकता तो अनैतिकता ही होती है
बात छोटी सी थी लेकिन मेरे मन पर अंकित हो गई.
ये भी समझ में आया कि नैतिकता के तक़ाज़े क्या होते हैं.कृष्णचंद्र शुक्ल उठकर जाने को थे कि मेरी नज़र उनके शर्ट की जेब पर पड़ गई.
मैने पूछा ताऊजी क्या पोस्ट ऑफ़िस से आ रहे हैं.बोले नहीं.मैने पूछा तो फ़िर
आपके जेब में इतने सारे पोस्ट कार्ड्स ? शुक्ल जी बोले , संजय हर वक़्त जेब में
कम से कम दस पोस्ट कार्ड्स रखे रखता हूँ.कोई विचार आया किसी अख़बार में
संपादक के नाम पत्र के लिये,तो सायकल सड़क के किनारे लगाई और सीट पर
लिख डाले अपने विचार.और घर पहुँचने के पहले जो भी निकटस्थ पोस्टबॉक्स
दिखाई दिया ..कर दी चिट्ठी पोस्ट.मैंने कहा इतनी जल्दबाज़ी विचार को लिख डालने
की क्यों ? बोले विचार का क्या है सही पते पर आ गया तो आ गया और नहीं
चिट्ठी को बेरंग होने में वक़्त थोड़े ही लगता है.मैने कहा मतलब समझा नहीं ताऊजी.शुक्लजी बोले देखो विचार आया और उसे पकाते हुए घर पहुँचो,पानी पियो,
सुस्ताओ,कोई आकर बैठा है या कोई डाक आई हुई है ...इतने में तो दिमाग़ में मेहमाँ हुआ ख़याल काफ़ूर हो जाता है.बस इसीलिये ये दस पोस्टकार्ड्स चाक-चौबंद से
जेब में दमकल से तैयार रहते हैं......

आज कृष्णचंद्र शुक्ल नहीं हैं और न ही हैं अख़बारों में नियमित रूप से प्रकाशित होने
वाले उनके पत्र , लेकिन उनकी याद और नसीहत दिल में हमेशा बसी रहती है.हाँ अपनी बात ख़त्म करते करते ये भी बताता चलूँ कि शुक्लजी गीता पर एक अथॉरिटी
थे और महज़ दस बारह पेजों में उन्होंने सीधी-सच्ची गीता शीर्षक से एक पुस्तिका का प्रकाशन भी किया था जिसे पढ़ कर आप पूरा गीता सार जान सकते हैं.उन्हें गीता
के अनेक श्लोक मुखाग्र याद थे.कहते हैं न एक बुज़ुर्ग के चले जाने से एक लायब्रेरी जल जाती है.

4 comments:

Gyandutt Pandey said...

डा. कृष्णचन्द्र शुक्ल सरीखे व्यक्तित्व विरल थे, अब और भी विरल होते जा रहे हैं। उनके बारे में बताने को धन्यवाद संजय।

Ashok Pande said...

संजय भाई, निःशब्द कर दिया आपने. अब इस काट के लोग मिलना मुश्किल है दुनिया में. उन्हीं का दिया हम लोग खा-पहन रहे हैं.

धन्यवाद! एक ज़बरदस्त व्यक्तित्व के बारे में इतनी आत्मीयता से बताने का.

सतीश पंचम said...

इस बुक पोस्ट की घटना से वो कहानी याद आ गई जिसमें एक बंदा किसी निजी काम से दरबार के अधिकारी से मिलने गया , देखा, कि वो चिराग जलाकर कुछ लिख रहा है, अधिकारी ने उसे देख कर चिराग बुझा दिया और दूसरा चिराग जला दिया, पूछने पर बताया कि वह सरकारी चिराग था, निजी काम के लिए सरकारी तेल जलाना उचित नहीं - अब ऐसे लोग कम होते जा रहे हैं या शायद होते ही नहीं।

Udan Tashtari said...

डा. कृष्णचन्द्र शुक्ल जी के बारे में बताने के लिए आभार.