Thursday, February 13, 2020
आज विश्व रेडियो दिवस है.
Friday, March 17, 2017
चार साल के बाद अपने प्रिय ठिकाने पर !
Sunday, February 10, 2013
समाज-सेवा का निराभिमानी सुमेरू-बाबूलाल बाहेती
Saturday, November 17, 2012
जिन्दादिली का एक बेहतरीन स्ट्रेट ड्राइव
कुछ लोग होते हैं जो अपनी पंसद से जिन्दगी का इंतेखाब करते हैं और खरामा खरामा उसे ऐसी जगह ले आते हैं जहाँ से पीछे मुड़कर देखा जाए तो एक रुहानी इत्मीमान आपके दिल में आकार ले लेता है. प्रो.सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी उन चंद इन्दौरियों में हैं जिन्होंने होलकरयुगीन क्रिकेट के सुनहरे दौर के सितारों को देखा और लिखा. कविता और शायरी से मुहब्बत की और उससे अपनी तासीर और तबियत को खुशमिजाज बनाया.अंग्रेजी पढ़ाई लेकिन हिन्दी खेल पत्रकारिता में नये नये मुहावरे गढ़े. रेखांकित करने योग्य तथ्य है कि हिन्दी खेल पत्रकारिता की शुरुआत नईदुनिया से हुई थी और राजेन्द्र माथुर,अभय छजलानी,प्रभाष जोशी,सुरेश गावड़े के साथ प्रो.चतुर्वेदी ने इस काम में व्यक्तिगत रुचि ली थी. सत्तर के दशक में टोनी ग्रेग की रहनुमाई में भारत आई इग्लैण्ड (तब एमसीसी) टीम से दिल्ली में हुए टेस्ट मैच की रिपोर्टिंग के लिये रज्जू बाबू ने प्रो.चतुर्वेदी को भेजा था.
प्रो.चतुर्वेदी बताते हैं कि बाळा साहब जगदाले ने उन्हें हिन्दी में लिखने के लिये प्रेरित किया और कहा कि अंग्रेजों के इस खेल को जनता में पहुँचाने के लिये हिन्दी में लिखा जाना बेहद जरूरी है. बाळा साहब क्रिकेट की कई तकनीकी बातों को हमें समझाया और नईदुनिया ने ही सबसे पहले क्रिकेट की कई नई इबारतें हिन्दी में रचीं.प्रो.चतुर्वेदी खुद स्कूली और क्लब क्रिकेट खेले हैं और दस से ज्यादा पुस्तके क्रिकेट पर लिख चुके हैं.इन्दौर स्पोर्ट्स राइटर्स एसोसिएशन (इस्पोरा) के संस्थापक रहे प्रो.चतुर्वेदी ने एक लम्बा समय शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय में प्राध्यापन किया और इन्दौर डिस्ट्रीक्ट क्रिकेट एसोसिएशन को उन दिनों में चलाया जब इन संस्थाओं के पास कोई वित्तीय कोष ही नहीं होते थे.वे कर्नल सी.के.नायडू,केप्टन मुश्ताक अली और मेजर जगदाले के मुरीद रहे हैं. गुजरे जमाने के इन्दौर को हर लम्हा जिन्दा रखने वाले प्रोफेसर साहब से बतियाना और उन्हें जानना यादों की अलमारी में रखे इत्र की महक का आनंद उठाने जैसा है.
क्रिकेट यदि उनका पहला प्यार है तो शायरी और कविता दूसरा.सन सत्तावन में गुजराती कॉलेज के छात्र के रूप में उन्हें एक कवि सम्मेलन की निजामत का मौका भी मिला था जिसमें नीरज,वीरेन्द्र मिश्र और रामकुमार चतुर्वेदी चंचल ने शिरकत की थी. शायरों में खुमार बाराबंकवी उनके चहेते रहे हैं और वे नब्बे के दशक में नीरज-खुमार की यादगार नशिस्त की मेजबानी भी कर चुके हैं.मल्हारगंज,जिमखाना,नेहरू स्टेडियम,नईदुनिया,यशवंत क्लब प्रो.एस.पी.चतुर्वेदी के खास ठिकाने रहे हैं.गौरवर्ण के मालिक,होठों में एक मासूम स्मित सजाकर रखने वाला यह शख्स कलम,किताब,क्रिकेट में रमा रहा है और जीवन के पिच पर आने गेंद पर एक खूबसूरत स्ट्रेट ड्राइव लगा कर ७५ अविजित है.एक बेहतरीन किस्सागो और जिन्दादिल इंसान को जीवन-शतक मुकम्मल करते देखना सुखकारी होगा;आमीन !
(पहले चित्र में प्रो.चतुर्वेदी केप्टन मुश्ताक अली और इग्लैण्ड के ख्यात क्रिकेटर ट्रेवर बैली के साथ.दूसरे में कविवर नीरज के साथ आत्मीय गुफ़्तगू)
Sunday, June 10, 2012
अनेक यादों का वह लैटर बॉक्स.

आज सुबह घूमने निकला तो उस इलाक़े में चला गया जहाँ जीवन का किशोर और युवावय बीता था. शायद एक दो दिन पहले कोई अतिक्रमण विरोधी मुहीम हुई थी जिससे वह दूध का वह साँची पॉइंट हटा दिया गया और यह लैटर-बॉक्स प्रकट हो गया . आधा ज़मीन में गढ़ा हुआ और आधा बाहर,सीधा न होकर टेढ़ा सा बेहाल खड़ा था वह लैटर बॉक्स. उसे देखकर अपनी जेब से मोबाइल निकाला और एक चित्र क्लिक कर लिया.मोबाइल में चित्र देखा तो लगा वह लैटर बॉक्स कह रहा है शुक्रिया ! भाई,शायद कल मैं रहूँ न रहूँ, ये तस्वीर ज़रूर तुम्हारे पास रखे रखना.याद आया कि हम कॉलोनीवालों ने बड़े डाक-घर में जाकर इसे सत्तर के दशक में अपने इलाक़े में स्थापित करवाया था लेकिन देखते ही देखते कुरियर कल्चर ने पोस्ट ऑफ़िस जाने,डाक टिकिट/पोस्टकार्ड,अंतरदेशीय पत्र ख़रीदने और लैटर बॉक्स में चिट्ठी को पोस्ट करने की आदतें ही गुम करवा दीं.. इस पुराने लैटर बॉक्स को देख कर दीवाली पर डाले गये उन शुभकामना पत्रों की याद हो आई जो मैं हाथ से बनाता और सजाता था क्योंकि तब चिकने और रंग-बिरंगे महंगे ग्रीटिंग्स के बाज़ार ने लय नहीं पकड़ी थी. शुभकामना पत्र भेजते ही मन में ये भी बेचैनी भी होने लगती कि कब फ़लाँ रिश्तेदार/ मित्र तक यह पहुँचेगा और मज़मून और सजावट की तारीफ़ का प्रति-उत्तर कब आएगा.रोज़गार समाचार में बहुतेरी नौकरियों के इश्तेहारों पर भेजी अर्ज़ियों की स्मृति भी मन में उमड़ आई.भीगे भीगे मौसम में पोस्ट किये गये राखी के वे लिफ़ाफ़े भी याद आए जिन्हें माँ अपने भाईयों के लिये पोस्ट करवाती थी. कैसा जोश होता था उस वक़्त जब दौड़ कर लैटर बॉक्स तक पहुँच जाते थे.चिट्ठी पोस्ट होते ही यह मन ये ख़याल बुनने लगता कि अब मामा के घर जाने या मामा के अपने यहाँ आने का मज़ा मिलने वाला है. तब भी सुबह जल्दी डाक निकलती थी सो देर-रात को चिट्ठी पोस्ट करने जाने का जुनून कुछ अलग ही होता.बचपन में हमेशा यह कौतुक बना रहता कि चिट्ठी इस डिब्बे में डालते हैं ये तो ठीक है लेकिन कब और कौन उसे इसमें से निकालकर दूसरे शहर तक पहुँचाता होगा.जब लिखने पढ़ने का जोश ज़ोर मारने लगा तो इसी लैटर बॉक्स ने ही आसरा दिया था. पत्र संपादक के नाम लिखी कई चिट्ठियाँ इस डिब्बे के हवाले की थी जो छपतीं तो इस डिब्बे को शुक्रिया अदा करने को जी चाह्ता था.भवानीप्रसाद मिश्र,रामनारायण उपाध्याय,बालकवि बैरागी,महादेवी वर्मा को लिखी गई चिट्ठियाँ इसी लैटर बॉक्स से रवाना की थी.पोस्ट करने के पहले भी एक झिझक सी रहती थी कि कहीं कुछ ग़लत तो नहीं लिख दिया. गाँव में रह रहे दादाजी को ये सूचना देने में बड़ा मज़ा आता था कि मेरे इम्तेहान शुरु हो रहे हैं और इतनी तारीख़ को ख़त्म होंगे.पत्र में ये लिखना होता कि इस तारीख़ को मैं आपके पास छुट्टियाँ बिताने पहुँच जाऊँगा.ऐसे ख़त को पोस्ट करते ही लगता कि जैसे आज और अभी इम्तेहानों से मुक्ति मिल गई.आज इस पुराने लैटर बॉक्स को देखते ही शरद जोशी का व्यंग्य पोस्ट-ऑफ़िस याद आ गया जो उन्होंने इन्दौर के एक कवि-सम्मेलन में पढ़ा था और हज़ारों श्रोता लोटपोट हुए जा रहे थे. आज ज़माने बाद उस प्रिय लैटर बॉक्स को बेहाली में देखना दु:खद था. मैं तो अपनी सुबह की सैर पर आगे निकल गया लेकिन इस लैटर बॉक्स ने मुझे अतीत के गलियारों की सैर करवा दी. सोचता हूँ कि आज की पीढ़ी को तो शायद मालूम भी नहीं कि अपने क्षेत्र का लैटर बॉक्स कहाँ होगा क्योंकि वे तो अपने मोबाइल और कम्प्यूटर से रवाना किये जा रहे एसएमएस और ईमेल की दुनिया के वासी हैं न ! अब जब सबकुछ मशीनी हो गया है तो कहीं इस लैटर बॉक्स के लिये भावनाओं के यह प्रकटीकरण भी बेमानी तो नहीं ?
Sunday, April 22, 2012
सत्य साई बाबा की असली विरासत (प्रथम महासमाधि दिवस 24 अप्रैल)
Wednesday, August 17, 2011
सुरेश कलमाड़ी-अन्ना हज़ारे वार्तालाप !
अन्ना हज़ारे की गिरफ़्तारी के बाद दिन भर सूचनाओं का सैलाब उमड़ता रहा. टीवी चैनल,फ़ेसबुक,ट्विटर,सभी ओर से अलग अलग बातें आम आदमी तक पहुँचतीं रहीं.ये ख़बर भी आई कि अन्ना को तिहाड़ जेल ले जाया गया है.और अन्ना हज़ारे को राष्ट्रमण्डल खेलों में घोटाले के आरोपों से घिरे सुरेश कलमाड़ी के पास के कमरे में ही जगह दी गई.तब मन में यह विचार आया कि यदि सुरेश कलमाड़ी और अन्ना हज़ारे आपस में मिले होंगे तो उनके बीच क्या संवाद होगा. पेश है एक काल्पनिक वार्तालाप कलमाड़ी और अन्ना के बीच. आप महसूस करेंगे कि इस भेंट का अंडर-करंट ही वर्तनाम राजनीति और हमारे समय की सब से बड़ी सचाई है.
कलमाड़ी: या बाबा या (आइये बाबा आइये)
अन्ना: अरे वाह ! आपने मुझे पहचान लिया,मैंने तो सुना था कि आपकी याददाश्त चली गई है.
कलमाड़ी:चलता है बाबा. याददाश्त का क्या है. है और नहीं भी.पर आप यहाँ कैसे ?
अन्ना:आपकी सरकार ने मुझे भेजा है यहाँ.
कलमाड़ी: पर आपने माहौल भी तो बना दिया था ऐसा !
अन्ना: मैं क्या करूँगा सुरेश राव ! ग़लत कामों का जवाब तो जनता मांग रही है.
कलमाड़ी: पर एक बात बताइये;रातो रात नया खेल क्या कर दिया आपने भ्रष्टाचार वाला ?
अन्ना: अरे तुम तो खेल खेल में बड़े खेल करने वाले हो और मुझसे पूछते हो कैसे खेल कर दिया.
कलमाड़ी:(खिसियाते हुए) नहीं अन्ना मैं तो देश की इज़्ज़त को आगे लाने के लिये लगा हुआ था.
अन्ना: काहे की इज़्ज़त रे. कभी तुम सोचते भी हो कि एक आम आदमी कैसे अपना पेट काट कर जीवन जीता है और तुम लोग भरी धूप में ग़लत काम करके भी बच निकलते हो.
कलमाड़ी: अन्ना हम तो जनता के सेवक हैं.
अन्ना:फ़ालतू बात करते हो. बड़े आए सेवक .
कलमाड़ी: अन्ना,अच्छा ये बताओ कि क्या खाओगे ? अंगूर या एप्पल का ज्यूस ?
अन्ना: मेरा तो अनशन है. पर ये बताओ कि यहाँ ये ज्यूस कैसे आता है ?
कलमाड़ी:अरे अन्ना आप भी;छोड़ो आपके लिये ये समझना मुश्किल है ज़रा.
अन्ना:और क्या क्या हो जाता है.
कलमाड़ी:आप जो बोलो वह फ़ूड आ जाएगा,चायनीज़,इटालियन,काँटीनेंटल (चहकते हुए) आप बोलो तो सही.
अन्ना:नहीं नहीं, मैं तो अनशन पर हूँ मैं देश को यही कह कर आया हूँ.
कलमाड़ी: अरे बाबा ! इथे कुठे आला देश (यहाँ कहाँ आ गया देश) कौन देख रहा है.
अन्ना: अरे सुरेश,भलेमानुष,मेरी अपनी आत्मा तो देख रही है न मुझे. मैंने कहा है कि अनशन करूंगा, तो करूंगा.तुममें और मुझमें यही तो फ़र्क़ है. तुम्हें किसी का लिहाज़ और डर नहीं. तुम अपनी आत्मा को मार कर नेतागिरी करते हो और मैं अपनी चाहनाओं को मार कर जनता की सेवा करने निकला हूँ. तुम सेवा का ढोंग करते हो और मैं सेवा को भगवान की पूजा मानता हूँ.
कलमाड़ी:अरे बाप रे ! तुम्हारी बातें तो अपनी समझ से परे है. अपन तो बाबा भूखे नहीं रह सकते. अच्छा ये बताओ कि तुम्हारी राजनैतिक महत्वाकांक्षा क्या है. आखिर ये भ्रष्टाचार वाली डुगडुगी कब तक बजाओगे ? थक जाओगे, अन्ना.बोलो तो किसी पार्टी से तुम्हारा पोलिटिकल गठजोड़ करवा दूँ ?
अन्ना:क्यों मेरा बुढापा बिगाड़ने पर तुला है रे सुरेश. मरते दम तक अपने वचन से नही डिगूंगा. और जहाँ तक किसी तरह की इच्छा,कामना और आकांक्षा का प्रश्न है वह तो अब मर गई मेरे भाई. अब तो मेरे करोड़ो देशवासियों को न्याय मिले बस यही आखिरी इच्छा है.और हाँ पार्टी-पॉलिटिक्स करनी होती तो कभी की कर लेता भाऊ !
कलमाड़ी:अच्छा अन्ना,एक बताओ ! ये भूखे रहने की ताक़त कहाँ से आती है ?
अन्ना: सुरेश जब करोड़ों भूखे-नंगे लोगों के चित्र मन में उभरने लगते हैं न अपने आप भूख मर जाती है.तुझे मालूम नहीं कि आज़ादी के ६४ साल बाद भी करोड़ों लोग ऐसे हैं तो कई कई दिन तक भूखे रहते हैं.एक बार तुम जैसे लोग उन ग़रीब-गुर्गों में जाकर देखो,अपने आप समझ जाओगे कि अन्न के बिना कैसे रहा जाता है.
कलमाड़ी:अन्ना एक बात बताओ न ! क्या आपके पास मेरे लिये यहाँ से सही सलामत निकलने का कोई आसान सा उपाय है,क्या है कि दिन तो बीत जाता है, रात को नींद नहीं आती.
अन्ना:बड़ा आसान है सुरेश,सत्य और सिर्फ़ सत्य ! सच कुबूल करो. जनता सच्चे को माफ़ करती है. क्योंकि अंत में तो तुम्हें सच बोलना ही पड़ेगा.
कलमाड़ी:तुम बताओ गाँधी बाबा को सच बोलकर क्या मिला ? गोली न ! तुम्हें क्या मिल रहा है सच बोलकर. तुम्हारे पास कितना अभाव है न कार है,न परिवार है,न बंगला है न बैंक बैलेंस है....और फ़िर तुम पर झूठे आरोप लग रहे हैं !
अन्ना: चल ऐसा कर ये शे’र सुन ले,तू अपने आप समझ जाएगा कि मेरे पास क्या है
दामन में मेरे सैकड़ों पैबंद लगे हैं
पर शुक्र है ख़ुदा का कोई दाग़ नहीं है.
Sunday, May 1, 2011
नरहरि पटेल को आंचलिक रचनाकार सम्मान
भोपाल के दुष्यंतकुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय के तत्वावधान में आयोजित एक विशेष समारोह में मालवा के वरिष्ठ कवि एवं संस्कृतिकर्मी श्री नरहरि पटेल को आंचलिक रचनाकर सम्मान से नवाज़ा गया. इस अवसर पर वरिष्ठ कवि श्री राजेश जोशी को दुष्यंतकुमार अलंकरण,कवि प्रो.भगवत रावत एवं कहानीकार श्रीमती मालती जोशी को सुदीर्घ साधना सम्मान तथा श्री इक़बाल मजीद को अमृत साधना सम्मान से विभूषित किया गया. सी.वी.रमन विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री संतोष चौबे के मुख्य आतिथ्य एवं सागर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और वरिष्ठ आलोचक डॉ.धनंजय वर्मा की अध्यक्षता में आयोजित इस समारोह में बड़ी संख्या में साहित्य तथा संस्कृति के जाने माने हस्ताक्षरों ने शिरक़त की.
संतोष चौबे ने अपने उदबोधन में कहा कि अपने समय के महत्वपूर्ण रचानाकारों को सम्मानित करना एक अदभुत अनुभव है. डॉ.धनंजय वर्मा ने ने कहा कि दुष्यंतकुमार संग्रहालय अल्प समय में साहित्यिक पर अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज़ चुका है और इसके द्वारा किये जा रहे सुकार्य अत्यंत ठोस हैं.डॉ.वर्मा ने सम्मानित साहित्यकारों को बधाई देते हुए उन्हें सामाजिक सरोकारों के प्रति सजग रहने पर बधाई भी दी.
कविवर नरहरि पटेल ने सम्मान पर प्रतिभावना व्यक्त करते हुए कहा कि ये मेरा सम्मान तो है ही साथ ही मालवा के उस भावुक आदमी का सम्मान भी है जो हर हाल में गाता है और अपनी मिट्टी और तहज़ीब का दामन नहीं छोड़ता. उल्लेखनीय है कि नरहरि पटेल ने मालवी ग़ज़ल के क्षेत्र में अनूठा कार्य किया है और उनकी रचनाएं पूरे परिवेश की नुमाइंदगी करतीं हैं. नरहरिजी ने कहा कि उन्हें दुष्यंतकुमार की ग़ज़लों से ही मालवी ग़ज़ल में काम करने की प्रेरणा मिली अत: दुष्यंतकुमार संग्रहालय में सम्मानित होगा वाक़ई विशेष गौरव और आनंद की अनुभूति दे रहा है.आरंभ में श्री नरेन्द्र दीपक ने संस्था का परिचर दिया तया आभार संग्रहालय के अध्यक्ष श्री रामराव वामनकर ने माना.सम्मानित रचानकारों और अतिथियों का परिचय देते हुए राजुरकर राज ने सम्मान समारोह का भावपूर्ण संचालन किया.।
Thursday, January 6, 2011
अपने बच्चे को बच्चा ही रहने दीजिए !

यदि आप एक पालक हैं तो आपके मन में अपने बालक के लिये कई उम्मीदें होंगी कि वह एक डॉक्टर, एक अभियंता, वैज्ञानिक या कोई यशस्वी व्यवसायी बने। मेरा मानना है कि आपकी ये उम्मीदें आपके बालक के भविष्य और आपके जीवन में उसके स्थान को ध्यान में रखते हुए ही होंगी।
चूँकि एक अच्छी शिक्षा अक्सर अच्छे भविष्य का पासपोर्ट होती है, मेरी मान्यता है कि इसी कारण यह उद्देश्य आपको आपके बालक को एक अच्छे विद्यालय में प्रवेश हेतु प्रेरित करता है, तत्पश्चात् आप बालक को अच्छी पढ़ाई कर परीक्षा में अच्छी सफलता पाने के लिये प्रोत्साहित करते हैं। इसी उद्देश्य को अधिक सुनिश्चित करने के लिये आप उसे किसी ट्यूशन क्लास में भी भेजते हैं। फलस्वरूप वह बालक बोर्ड की परीक्षाएँ और अन्य प्रवेश परीक्षाएँ देने हेतु विवश होता है ताकि उसे किसी अच्छे व्यवसायिक अभ्यासक्रम में प्रवेश मिल सके। महाविद्यालय में अच्छा यश पाने से उसे एक अच्छी नौकरी पाने की संभावनाएँ बढ़ जाती हैंऔर एक अच्छी नौकरी का अर्थ बालक का भविष्य सुनिश्चित हो जाना होता है।
मैं स्वयं न एक मनोवैज्ञानिक हूँ; ना ही एक शिक्षाविद्, और अब मैं जो कहूँगा वह उपरोक्त विचारों के एकदम विरूद्ध लग सकता है। मेरे विचार में यही अपेक्षाएँ और तद्नुसार की गई क्रियाएँ आपके बालक को अच्छाई कम और नुकसान अधिक पहुँचा सकती हैं ! ऐसा क्यों ? यह समझने के लिये हमें अपनी मूलभूत मान्यताओं को पुन: देखना होगा।
सर्वप्रथम, मैंने बार-बार यह देखा है कि किसी दूरस्थ भविष्यकालीन उद्देश्य के लिये प्रयास करते जाने का अर्थ है आप वर्तमान में नहीं जी रहे हैं। उस दूरस्थ उद्देश्य का परिणाम होगा, यश पाने के लिये परीक्षा जैसे बाह्य साधनों का आधार लेना और अधिकांश बच्चों का परीक्षा-केन्द्रित होना। उनका बच्चे होना-जैसे उत्सुक, मसखरा, शोधक, गिरना, उठना, संबंध रखना, खोज करना, संशोधन करना, काम करना, खेलना आदि वे भूलते ही जाते हैं।
बाल्यकाल एक बड़ी मौल्यवान बात होती है; ऐसी मौल्यवान, जो ज़बरदस्ती लादी गई स्पर्धाओं के नकली बोझ, किताबी अध्ययन के अनगिनत घंटों और समूचे इंसान को मात्र आँकड़ों में ही सहजता से लपेटने वाली स्कूली रिपोर्टों के द्वारा नष्ट नहीं की जानी चाहिए।
दूसरी मान्यता यह है कि सामाजिक-आर्थिक उति के लिये शिक्षा मात्र एक टिकट जैसी है, अपने राष्ट्र की वर्तमान अवस्था देखने पर यह सत्य भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। किंतु शिक्षा को केवल इसी पहलू तक सीमित रखना, मेरे विचार से शिक्षा को एक बहुत सीमित उद्देश्य के दायरे में रखना होगा। किसी विद्यालय का प्राथमिक उद्देश्य बालक को स्वयं की और अपने विश्व की खोज करने हेतु मार्गदर्शन करना और बालक की क्षमताओं को पहचान कर उनको आकार देना होता है। जैसे की एक बीज में एक भविष्य का वृक्ष छिपा होता है उसी प्रकार एक बालक अनगिनत क्षमताओं के साथ ही जन्म लेता है। ऐसे एक विद्यालय की कल्पना कीजिए जो बच्चों को बोने हेतु बीजों के रूप में देखता है-यहॉं एक शिक्षक ऐसा माली होता है जो बालकों की जन्मजात क्षमताओं को उभारने में मदद करता है। यह विचार उस वर्तमान दृष्टिकोण से, जिसमें यह माना जाता है कि एक बालक मात्र एक मिट्टी का गोला होता है जिसे अपनी इच्छानुसार ढालने वाले उसके माता-पिता और शिक्षक एक मूर्तिकार होते हैं, एकदम विपरीत है। एक पुरानी (अब स्मृति शेष भी न रही) चीनी कहावत है, एक कुम्हार को एक बीज दीजिये, और आप पाएँगे एक बोनसाई (गमले में उगा बौना वृक्ष)। एक व्यापारी संस्थान में भी लाभ पाने के लिये उसका पीछा करने से काम नहीं हो पाता। हमें एक ऐसी संस्था बनानी होती है जिसमें हर कर्मचारी को अर्थपूर्ण तथा संतोषप्रद काम करने के अवसर देना होते हैं। एक ऐसे संगठन का निर्माण हो जिसमें नवीनता, नेकी, ग्राहक-केन्द्रिता हो तथा आस्था ही उसकी चालना हो। जैसे ही आप हर पल, हर दिन इन मूल्यों का पालन करेंगे आप यह पाएँगे कि लाभ अपनी चिंता स्वयं ही कर लेता है।
ठीक उसी तरह प्रिय पालकगण, मेरी आपसे भी एक विनती है, अपने बालक का भविष्य सुरक्षित करने के लिये उसके बचपन को न गॅंवाइए। अपने बालक को निश्चिंतता से उसका जीवन टटोलने और ढूँढने की स्वतंत्रता दीजिए। ऐसा करने पर आप अपने बालक को एक सृजनशील एवं संवेदनशील इंसान के रूप में फलता-फूलता देख पाएँगे और जब ऐसा होगा तब अन्य सब कुछ यानी समृद्धि, सामाजिक सफलता, सुरक्षा अपनी जगह अपने-आप पा लेंगे।
अपने बालक को बालक ही रहने दीजिए !
(इस लेख को अंग्रेज़ी में विख्यात उद्योगपति अज़ीम प्रेमजी ने लिखा था;ब्लॉग बिरादरी के लिये अनुवाद कर अपने ब्लॉग पर जारी किया है.)
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Sunday, August 15, 2010
जश्ने आज़ादी को परवाज़ देती एक पारिवारिक ख़ुशी

किसी ने सच ही कहा है कि देशप्रेम की अभिव्यक्ति प्रसंग,मौक़े,दस्तूर,स्थान,धर्म और मज़हब की मोहताज नहीं होती.उसे किसी भी रूप में और रचनात्मक तरीक़े से व्यक्त किया जा सकता है. कुछ ऐसा ही भावुक इज़हार एक ऐसे शुभकामना पत्र में देखने में आया जिसमें परिवार में गूँजी नई किलकारी ख़ुशी जश्ने आज़ादी की ख़ुशी दूध में मिली शकर की मिठास की तरह घुल गई है.
इन्दौर में ही रहने वाले मेरे पारिवारिक मित्र महेश बंसल बरसों से
समाज,राजनीति,संस्कृति ,मीडिया क्षेत्र के मित्रों तथा अपने परिजनों को स्वतंत्रता-दिवस का शुभकामना पत्र भेजते आ रहे हैं. इस बरस कुछ ऐसी स्थिति बनी कि श्री बसंल को सेंट डिएगो(यू.एस) में बस चुके पुत्र प्रतीक और बहू सुरभि के परिवार में वृध्दि होने का समाचार आया. अभी तक महेश बंसल स्वतंत्रंता सेनानियों को केन्द्र में रखकर अपना शुभकामना पत्र बनाते आए थे.इस बार उन्होंने परिवार में आने वाले नये मेहमान को केन्द्र में रखकर कुछ नया करने का विचार बनाया. कहते हैं कि विचार का इंतेख़ाब करो तो उसे साकार करने का हौसला भी मिल जाता है. महेश बंसल अपनी पत्नी आशा के साथ जुलाई के अंतिम सप्ताह में विदेश .रवाना होने के पहले अपने शुभकामना पत्रों के लिफ़ाफ़े नाम-पते लिखकर तैय्रार कर गये और तैयार कर गए एक भावुकतापूर्ण संदेश जो परिवार में नई किलकारी के गूँज के साथ राष्ट्रप्रेम की बात भी करता है.
प्रतीक-सुरभि के यहाँ बेटी श्रेया का जन्म होते ही अस्पताल पहुँच कर दादा महेश बंसल ने उसके हाथ में दे दिया छोटा सा तिरंगा और इसी अवसर के चित्र को लेकर बन गया इस बार का शुभकामना पत्र .इस चित्र में नन्ही श्रेया ने अपनी मुट्ठी में मज़बूती से थाम रखा विजयी विश्व तिरंगा प्यारा.लिफ़ाफ़े पर लिखी इबारत मन को छूती हुई कहती है ...भारत माता हर एक नई मुस्कान;आपको करे प्रणाम.इस ग्रीटिंग को देखने के बाद मन में यह बात बहुत शिद्दत से महसूस होती है कि स्वतंत्रता दिवस या दीगर राष्ट्रीय पर्वों की अभिव्यक्ति को रस्मी न बना कर यदि बेतक़ल्लुफ़ अंदाज़ में किया जाए तो शायद हमारी मातृभूमि और उसके अमर सेनानियों के प्रति अधिक सार्थक और जज़बाती श्र्ध्दा जाग सके.
यदि आप महेश बंसल को उनके इस सुकार्य के लिये बधाई देना चाहते हों तो उनका ईमल पता नोट करें: maheshbansal123@gmail.com आज इसी प्रयास को मेरे शहर के दो समाचार पत्रों दैनिक भास्कर और नईनिया ने भी प्रमुखता से प्रकाशित किया है.
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Monday, August 9, 2010
रज्जू बाबू की याद के बहाने

शनिवार ७ अगस्त को वरेण्य पत्रकार राजेन्द्र माथुर का पिचहत्तरवाँ जन्म दिवस था. वरिष्ठ कवि और रज्जू बाबू के अनन्य सखा डॉ.सरोजकुमार,नईदुनिया के स्थानीय संपादक और मैं एक पुस्तक विमोचन समारोह में बतौर मेहमान मंच पर थे. यह कार्यक्रम इन्दौर प्रेस क्लब के राजेन्द्र माथुर सभागार में आयोजित था और मंच से सामने नज़र आ रही थी रज्जू बाबू की तस्वीर. जयदीप भाई ने बड़ी भावुकता से रज्जू बाबू को याद किया और उनकी क़ाबिलियत का ज़िक्र भी किया. डॉ.सरोजकुमार ने भी आत्मीयतापूर्वक रज्जू बाबू को स्मरण करते हुए बताया कि उन्हें इस बात की पीड़ा जीवन भर रहेगी कि जिन मुम्बई और दिल्ली शहरों में स्थित प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों में देश भर के सामान्य लोग बिना किसी ज़रिये और पहचान के इलाज करवा आते हैं उन्हीं शहरों में राजेन्द्र माथुर और शरद जोशी जैसी अनन्य विभूतियों ने मामूली नर्सिंग होम्स में अपनी अंतिम साँस ली.
सरोजकुमार जी ने बताया कि जिस समय रज्जू बाबू नईदुनिया से विदा लेकर दिल्ली प्रस्थान करने वाले थे उसके पहले इन्दौर की कई संस्थाओं ने श्री माथुर के सम्मान में विदाई समारोह आयोजित किये. इन आयोजकों में से अधिकांश की इच्छा यह रहती थी कि रज्जू बाबू जाते जाते नईदुनिया के प्रति अपनी कडुवाहट प्रकट करें या यह कहें कि इस कारण मैंने नईदुनिया छोड़ दी. लेकिन रज्जू बाबू ताज़िन्दगी एक शालीन व्यक्तित्व के धनी रहे और उसी के मुताबिक आचरण करते रहे. उन्होनें इन विदाई समारोहों में हमेशा यही कहा कि मैं एक बढ़िया अख़बार से बड़े अख़बार में जा रहा हूँ.
७ अगस्त को ही सुबह अंग्रेज़ी दैनिक इकॉनिमक टाइम्स पर नज़र गई और सुखद अनुभूति हुई संपादकीय पृष्ठ पर जाकर जहाँ वरिष्ठ पत्रकार मधुसूदन आनंद ने तक़रीबन चार कॉलम में बड़े आदर से रज्जू बाबू को याद किया. उन्होंने लिखा कि रज्जू बाबू पाठक को भी अख़बार और सत्ता की लड़ाई की महत्वपूर्ण कड़ी मानते थे और देर तक दफ़्तर में बैठकर पाठकों के पत्रों को अख़बार के लिये प्रकाशन हेतु चुनते थे.
यह बताना प्रासंगिक होगा कि मूल रूप से एक अंग्रेज़ी प्राध्यापक के रुप में अपना करियर प्रारंभ कर चुके राजेन्द्र माथुर एक सजग स्वाध्यायी थे.देश विदेश की राजनीति के अलावा मैंने उन्हें इन्दौर के तक़रीबन हर हिन्दी नाटक और संगीत के जल्से में एक चैतन्य श्रोता/दर्शक के रूप में देखा था. शनिवार को ही मेरे शहर के एक पत्रकार से भी मुलाक़ात हुई और उसने बताया कि रज्जू बाबू हमेशा कहते थे कि हिन्दी में चार लाइन सशक्त लाइन्स लिखने के लिये अंग्रेज़ी की चार सौ लाइन नियमपूर्वक पढ़ा करों.
आज जब पत्रकारिता में अविश्वसनीय ग्लैमर और पैसा उपलब्ध है ऐसे में राजेन्द्र माथुर जैसे वैष्णव पत्रकार की याद आते ही श्रध्दा से सर झुक जाता है. रज्जू बाबू हमेशा आदरणीय बने रहेंगे.
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राजेन्द्र माथुर,
संपादक,
हिन्दी पत्रकारिता
Saturday, July 31, 2010
मोहम्मद रफ़ी;कुछ ऐसी बातें जो अब सच लग रहीं हैं.

बहुत मुख़्तसर में अपनी बात कहना चाहता हूँ क्योंकि आज रफ़ी साहब पर कुछ पढ़ने से ज़्यादा बेहतर होगा उन्हें सुना जाए. तीस बरस पहले गुज़र चुका यह सुरीला दरवेश आज भी यदि हमारे दिलोदिमाग़ में मौजूद है तो उसकी वजह बस इतनी भर है कि वह बहुत नेक इंसान थे और इस दुनिया ए फ़ानी से दुआओं का दौलत बटोर कर ले गए.रफ़ी साहब की बरसी के दिन दिल में छटपटाहट हो रही है और कुछ विचार आ रहे हैं जो आपके साथ बाँट कर हल्का हो जाना चाहता हूँ.
-रफ़ी साहब ज़िन्दा होते हुए जितने थे , उससे कहीं ज़्यादा हैं हमारे बीच.
-वे गुज़र जाने के बाद एक घराना बन गए हैं.तो जो भी उनके अंदाज़ में गा रहा है और उन्हें दोहरा है वह रफ़ी घराने का चश्मे-चिराग़ है.
-रफ़ी को दोहराया नहीं जा सकता,उनके अहसास को अपनी आवाज़ में समो कर गाया जा सकता है.
-रफ़ी साहब के गीतों को सुनकर ही हमें पता लगता है कि समकालीन समय का बेसुरापन क्या है और कितना ख़तरनाक़ भी.
-रफ़ी साहब ने सुगम संगीत की विधा में अपना काम कर के बता दिया कि शब्द प्रधान गायकी किस बला का नाम है और कविता/शायरी का निबाह क्या होता है.
-रफ़ी और लता हमारे समय के दो ऐसे बेजोड़ गायक हैं जिन्हें सुनकर इस बात की तसल्ली होती है कि फ़लाँ शब्द ऐसे ही बोला जाता है. इस लिहाज़ से मैं उन्हें तलफ़्फ़ुज़ की डिक्शनरी कहना चाहूँगा.
-दुनिया में हिन्दी चित्रपट गीतों की बात चले और रफ़ी साहब ख़ारिज कर दिये जाएँ ऐसा संभव ही नहीं.
-रफ़ी साहब जैसी गुलूकारी के लिये एक नेक तबियत होना बहुत ज़रूरी है वरना आपकी गायकी से सचाई का पता नहीं मिलेगा.
-रफ़ी साहब अपनी आवाज़ से जिस तरह के करिश्मे गढ़ गए हैं उन्हें सुनकर अंदाज़ लगाना मुश्किल है (बल्कि इस तरह का मतिभ्रम जायज़ भी है) कि रफ़ी साहब ने इन गीतों को गाया है ये गीत रफ़ी साहब की गायकी के लिये लिखे गए.
-जो रफ़ी ने गाया है उसे काग़ज़ पर लिख कर पढ़िये आपको समझ में आ जाएगा कि रफ़ी का दैवीय स्वर क्या है.उन्होंने किस बुलन्द अहसास के साथ शब्दों को जिया है.
-रफ़ी साहब शब्द को शून्य तक ले जाते थे...तब शून्य की गायकी बुलन्द हो जाती थी...भाव गाने लगता था.
-रफ़ी साहब गाते-गाते ख़ुद ग़ायब हो जाते थे..अभिनेता,सिचुएशन या दृश्य साकार हो जाता था, यही वजह है कि उनके गीतों का ऑडियो सुनने पर तस्वीर साकार हो जाती है.
आख़िरी बात...रफ़ी जैसा गायक फ़िर नहीं होगा..शर्तिया.रफ़ी जैसा गाने के लिये,गुनगुनाने के लिये शब्द के पार जाकर अहसास के समंदर में गोता लगाना होगा...गाते गाते गायक ग़ायब हो जाए तो समझिये वहीं मोहम्मद रफ़ी गा रहे हैं.
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Saturday, May 1, 2010
ले लो, ले लो झुमके अमलतास के

इन दिनों सुबह सैर पर निकल रहा हूँ तो रास्ते में जगह जगह अमलतास फूला हुआ है.
चटख़ रंगो वाले गुलमोहर की बहार भी छाई हुई है लेकिन अमलतास का शबाब कुछ और ही है. हरे पत्तों से लदा पेड़ तपती धूप में कब पीले झुमकों में तब्दील हो जाता है मालूम ही नहीं पड़ता. एक झूमर की शक्ल में कई झूमर लटके हैं अमलतास के. सिंथेटिक रंगों की दुनिया में रहने वाले हमारी नस्ल इस ख़ालिस पीलेपन को निहारने का वक़्त ही नहीं निकाल पाती है. सुबह के घुमन्तुओं में भी कुछ ही ऐसे मिले जो ठिठक कर अमलतास या गुलमोहर के नीचे खड़े हो जाएं और देखें तो कि कुदरत क्या खेल रच रही है. परमात्मा को देखा नहीं मैंने और न ही इस तरह की मान्यता भी है मन में लेकिन जब भी कु़दरत के इन करिश्मों को निहारता हूँ तो लगता है कि इन्हीं पेड़ों में बसा होगा वह.
अमलतास का एक फूल नहीं होता बल्कि पूरा एक कंदील पेड़ पर लटकता है.रात में पूर्णिमा के पूरे चाँद में अमलतास को देखा तो लगा जैसे किसी ने दीवाली की रात में पीले कंदील रोशन कर दिये हैं. तेज़ धूप में मेरे मालवा में दीगर दरख्तों को जहाँ झुरझुरी सी आ रही है और शाख़ें सूखी सी हैं वहीं अमलतास के पत्ते हरे कच्च हैं और फूल के इन झुमकों के तो क्या कहने.निसर्ग के लिये जिस तरह की बेपरवाही है और नई पीढ़ी में बेख़बरी का भाव है ऐसे में सोचता हूँ बहुत से पेड़ों के बीच ये अमलतास बड़ा वीराना और अकेला सा ही है . इसके झुमकों की ख़ास बास यह भी है कि वह बड़े हल्के वज़न के हैं और ज़रा सी हवा चलने पर झूमने लगते हैं .चूँकि ये झूमना भी दाएँ-बाएँ न होकर ऊपर-नीचे है तो उसमें एक ख़ास तरह की लयकारी दीखती है.
दिन में जैसे जैसे धूप बढ़ती है...अमलतास के झुमके कुछ और पीले होकर दमकने लगते हैं. इनके चटकीलेपन की वजह यह भी है कि फूलों के अनुपात में अमलतास के पत्ते भी नये-नकोरे और ज़्यादा हरे हरे हो गए हैं यूँ ये हरापन तो नैपथ्य में चला गया है और सर्वत्र फूलों का साम्राज्य ही नज़र आने लगता है. इस दौरान मुझे अमलतास कुछ इतराता नज़र आता है मानो आसपास के पेड़ों को संदेश देना चाहता हो कि मैं तो तुम्हारे मुक़ाबले ज़्यादा भरा-पूरा हूँ.हम ग्राफ़िक डिज़ाइनिंग वाले कांट्रास्ट रचने के लिये रंगों को एकाकार और विलग करते ही रहते हैं लेकिन क़ुदरत के सामने तो हमारा कम्प्यूटरी कांट्रास्ट क़मज़ोर ही दिखाई देता है.
इस अमलतास आख्यान को कविवर सरोजकुमार की कविता से विराम देते हैं;
अमलतास की रंगत का कितना अनूठा भान देते हैं न उनके शब्द:
बीत गए केशरिया
दिन पलाश के
ले लो, ले लो, झुमके अमलतास के
ओ पीपल,नीम, बड़,सुरजना
कौन जिसे नहीं है मुरझना ?
डलिया में दो दिन की
सौ दिन फूल के
कोई फ़िर क्यों मुरझे बिन हुलास के ?
झूल रहे चमकीले सौ-सौ फ़ानूस
इंक़लाब ? पीली तितलियों के जुलूस
सूरज के घोड़े बहके
ऐसी आग,
धूप निकल भागी है,बिन लिबास के
मौसम के हाथों पर मेहंदी के चित्र
धू धू दोपहरी,ये तपस्वी विचित्र
किसकी विरूदावलि के
स्वर्ण मालकौंस
कोई तो बतलावे, ये तलाश के
ले लो, ले लो, झुमके अमलतास के
(चित्र ख़ाकसार ने अपने मोबाइल से लिया है)
Wednesday, April 7, 2010
कुमार गंधर्व के जन्मदिन पर विविध भारती की सुरीली सौग़ात.

पं.कुमार गंधर्व अपनी विशिष्ट गायकी के साथ मालवा के लोक-संगीत और निरगुणी पदों के गायन के लिये हम सब संगीतप्रेमियों के चहेते हैं. 8 अप्रैल को उनके जन्मदिन से विविध भारती द्वारा अपने लोकप्रिय कार्यक्रम संगीत-सरिता में एक नई श्रंखला प्रारंभ हो रही है जिसमें कुमारप्रेमियों को कुछ अनमोल और अनसुनी बंदिशे सुनने को मिलेंगी. यह कार्यक्रम इसलिये भी विशेष बन पड़ा है क्योंकि इसे प्रस्तुत करने जा रहीं हैं कुमार जी सुपुत्री और शिष्या कलापिनी कोमकली. 21 अप्रैल तक चलने वाली इस प्रस्तुति में जानेमाने गायक और रंगकर्मी शेखर सेन कलापिनी से कुमारजी की स्वर यात्रा पर बतियाएंगे. कार्यक्रम का प्रसारण समय वही है यानी प्रात:7,30 बजे।कलापिनी बतातीं हैं कि इस कार्यक्रम में अल्पायु से संगीत परिदृष्य पर बालक कुमार की आमद कैसे हुई इसका ज़िक्र तो है ही साथ में उन रागों की बानगी भी है जो कुमारजी ने स्वयं रचे थे. उल्लेखनीय है कि पं.कुमार गंधर्व मूल रूप धारवाड़ अंचल में पैदा हुए, मुम्बई आकर प्रो.देवधर के शिष्य बने और अपनी रूण्गावस्था के दौरान मालवा के देवास क़स्बे में आकर बसे. यह वही देवास है जहा उस्ताद रज्जब अली ख़ा साहब भी हुए और जिनकी गायकी का असर उस्ताद अमीर ख़ाँ की गायकी में भी सुनाई दिया.
कलापिनी ने ये भी बताया कि कुमार गंधर्व एकमात्र ऐसे संगीतज्ञ हुए हैं जिन्होंने मालवांचल की बोली मालवी और उसके लोकगीतों को बंदिशों का स्वरूप दिया. उत्तरप्रदेश की अवधि का असर तो कई उत्तर भारतीय संगीत की बंदिशों में सुनाई दिया है जैसे बाजूबंद खुल खुल जाए,बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए,लागी लगन, बरसन लागी सावन बूंदिया लेकिन मालवी का शुमार कुमारजी ने ही किया. गीत-वर्षा एलबम में कई मालवी लोकगीत बंदिश का आकार लिये हुए हैं.
कार्यक्रम में बातचीत कर रहे शेखर सेन ने मुझे बताया कि पं.कुमार गंधर्व पूरे शास्त्रीय संगीत परम्परा में ऐसे स्वर साधक हैं जिनकी हर एक प्रस्तुति में रचनाधर्मिता के दर्शन होते हैं. उनके बारे में बात करना और कुछ दुर्लभ बंदिशों को सुनना अपने आप में एक अविस्मरणीय अनुभव है. उम्मीद करें कि संगीत-सरिता में स्वरों का यह झरना तपते वैशाख में हम सब संगीतप्रेमियों के लिये एक अदभुत अनुभव होगा.
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Sunday, April 4, 2010
आज से उजाले अपनी यादों के लेकर आ रहे हैं सलीम ख़ान
विविध भारती एफ़.एम. सेवा पर ’उजाले अपनी यादों के’श्रोताओं का बेहद पसंदीदा कार्यक्रम रहा है. हाल ही में हुए कार्यक्रम परिवर्तन के मुताबिक अब यह कार्यक्रम प्रत्येक रविवार को अपराह्न ४ बजे प्रसारित होगा. कार्यक्रम की समय सीमा भी एक घंटे की कर दी गई है.४ अप्रैल से प्रारंभ होने वाली नई श्रंखला में अतिथि कलाकार के रूप में इस कार्यक्रम में आ रहे हैं मशहूर संवाद लेखक जोड़ी सलीम-जावेद के सलीम ख़ान.विविध भारती के लोकप्रिय उदघोषक यूनुस ख़ान ने सलीम ख़ान से यह लम्बा इंटरव्यू उनके बांद्रा स्थित गैलेक्सी अपार्टमेंट में रेकॉर्ड किया है
उल्लेखनीय है कि इन्दौर में जन्मे और पढ़े-लिखे सलीम ख़ान संवाद लेखन के पहले अभिनय की दुनिया में क़िस्मत आज़माने मुम्बई तशरीफ़ लाए थे. उजाले अपनी यादों के कार्यक्रम में सलीम ख़ान ने गुज़रे ज़माने के अपने उस शहर इन्दौर की बेशुमार यादों को ताज़ा किया है. जिसमें मालवा का खानपान,पहनावा,रीति-रिवाज और रहन-सहन शामिल हैं.याद किया है अपनी उन माशूकाओं को जो अब दादी-नानी बन चुकीं हैं.और जानकारी दी है अपनी तेज़ रफ़्तार से भागने वाली उस मोटरसायकल की जो उन दिनों शहर इन्दौर में चर्चा का केन्द हुआ करती थी. हाँ इन्दौर के फ़्लाइंग क्लब का स्मरण भी आया है इस बातचीत में; जहाँ एक प्रशिक्षित पायलेट के रूप में सलीम ख़ान हवाई जहाज़ उडाया करते थे.यूनुस ख़ान से हुई इस गुफ़्तगू में रतलाम, जावरा,देवास,उज्जैन जैसे गावों और क़स्बों का ज़िक्र भी आया है.
कई कड़ियों में प्रसारित होने वाली इस बातचीत में इंदौर के मोहल्ले, सिनेमाघर, स्कूल और कॉलेजों की यादें भी सम्मिलित हैं.रेकॉर्डिंग की लम्बाई के मद्देनज़र हो सकता है कि विविध भारती के श्रोताओं को पूरा एक एपिसोड इन्दौर पर सुनने को मिले.एक ख़ास कड़ी में सलीम ख़ान अपने साहबज़ादे और अभिनेता सलमान पर बतियाएंगे.दो कडियों में उनकी पत्नी सलमा और अभिनेत्री हेलन पर भी चर्चा हुई है.
ग़ौरतलब है कि सलीम ख़ान एक शानदार किस्सागो हैं और उनके ज़हन में साठ के दशक से लेकर आज तक के सिनेमा,उसकी निर्माण प्रक्रिया,कहानी लेखन, अदाकारी,संगीत और निर्देशन को लेकर सैकड़ों क़िस्से ताज़ा हैं.तो विविध भारती एफ़.एम.पर सुनना न भूले ..उलाले अपनी यादों के...
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Friday, March 5, 2010
मुझे कौन चाहता है ?
मेरे बच्चे और पत्नी
जिनके लिए मैं हमेशा एक बेयरर चैक हूँ
ख़ुशियों का, उल्लास का या अपनेपन का.
कुछ परिजन ?
जो चाहते हैं कि मैं उनसे हमेशा सहमत हो जाऊँ
वे कुछ भी कहें; मैं उनकी हाँ में हाँ मिलाऊँ
कुछ मित्र
जो मुझे ज्ञानमार्गी,ज़िद्दी,अपनी बात पर
अड़ा रहने वाला शख़्स मानते हैं..सामने तारीफ़ करते हैं;
पीछे एक दूसरे से खुसफ़ुसाहट करते हैं;
ये बड़ा सनकी सोल्जर है …!
कुछ कलाकार
जो फ़ुसफ़ुसाते हैं कि ये माइक
पर आया तो इवेंट खा जाता है और पूरा माइलेज लूट लेता है
सामने मिलूँ तो कहते हैं वाह क्या आवाज़ दी है भगवान ने आपको
और क्या कमाल का अंदाज़ है आपका,क्या स्वर और शब्द फ़ूटते हैं मुख से !
मेरे ग्राहक
जो काम निकले तो गुण-ग्राहक हो जाते हैं मेरे
और जब उनकी शर्तों पर न बिकूँ तो बिना मुझे बताए
किसी और को दे देते हैं सारा काम
कुछ पाठक
जो पढ़ते ही कहते हैं …लिखता तो
ठीक है लेकिन बहुत ठसके से लिखता है,
कहाँ से लाता है ज़ुबान की ऐसी रवानी
सामने मिल जाए वही पाठक तो कहेगा
आह ! क्या ग़ज़ब का लिखा था आपने
पूरा चित्र खड़ा कर दिया !
कभी कभी सोचता हूँ कि मैं ही चाहता हू मुझे
इन सारे दोषों के साथ जो मुझमें मेरे आसपास
के लोग देखते हैं मुझमें..
उन सबका ऐसा सोचना मुझे और बेहतर करने की
हिम्मत जो देता है,लड़ने की जज़्बा देता है अपने आप से .
और इन लोगों की तारीफ़.
.तारीफ़ का क्या है हुज़ूर …
ये सभागार की वह तालियाँ हैं
जो बजती हैं थोड़ी देर के लिये
और फ़िर ख़ामोश हो जातीं हैं.
इनके भरोसे कोई ज़िन्दगी कटती है;
या फ़िर कोई कुछ कर सकता है ;
बातें हैं ये;बातों का क्या.
जिनके लिए मैं हमेशा एक बेयरर चैक हूँ
ख़ुशियों का, उल्लास का या अपनेपन का.
कुछ परिजन ?
जो चाहते हैं कि मैं उनसे हमेशा सहमत हो जाऊँ
वे कुछ भी कहें; मैं उनकी हाँ में हाँ मिलाऊँ
कुछ मित्र
जो मुझे ज्ञानमार्गी,ज़िद्दी,अपनी बात पर
अड़ा रहने वाला शख़्स मानते हैं..सामने तारीफ़ करते हैं;
पीछे एक दूसरे से खुसफ़ुसाहट करते हैं;
ये बड़ा सनकी सोल्जर है …!
कुछ कलाकार
जो फ़ुसफ़ुसाते हैं कि ये माइक
पर आया तो इवेंट खा जाता है और पूरा माइलेज लूट लेता है
सामने मिलूँ तो कहते हैं वाह क्या आवाज़ दी है भगवान ने आपको
और क्या कमाल का अंदाज़ है आपका,क्या स्वर और शब्द फ़ूटते हैं मुख से !
मेरे ग्राहक
जो काम निकले तो गुण-ग्राहक हो जाते हैं मेरे
और जब उनकी शर्तों पर न बिकूँ तो बिना मुझे बताए
किसी और को दे देते हैं सारा काम
कुछ पाठक
जो पढ़ते ही कहते हैं …लिखता तो
ठीक है लेकिन बहुत ठसके से लिखता है,
कहाँ से लाता है ज़ुबान की ऐसी रवानी
सामने मिल जाए वही पाठक तो कहेगा
आह ! क्या ग़ज़ब का लिखा था आपने
पूरा चित्र खड़ा कर दिया !
कभी कभी सोचता हूँ कि मैं ही चाहता हू मुझे
इन सारे दोषों के साथ जो मुझमें मेरे आसपास
के लोग देखते हैं मुझमें..
उन सबका ऐसा सोचना मुझे और बेहतर करने की
हिम्मत जो देता है,लड़ने की जज़्बा देता है अपने आप से .
और इन लोगों की तारीफ़.
.तारीफ़ का क्या है हुज़ूर …
ये सभागार की वह तालियाँ हैं
जो बजती हैं थोड़ी देर के लिये
और फ़िर ख़ामोश हो जातीं हैं.
इनके भरोसे कोई ज़िन्दगी कटती है;
या फ़िर कोई कुछ कर सकता है ;
बातें हैं ये;बातों का क्या.
Thursday, January 14, 2010
मन को पतंग बना लो

उड़ती है वह बेख़बर
जैसा उड़ाने वाला चाहे
कितना समर्पण है उसमें
न कोई चाहना
न कोई शर्त
हवा के रूख़ को
हमसफ़र बना कर
उड़ती रहती है
वह अनंत आकाश में
हम मन को भी पतंग
बना लें तो कितना अच्छा हो
अनंत में उड़ते रहें
बिना किये परवाह
कौन उड़ा रहा है
कौन काट डालेगा
क्या होगा मेरा अस्तित्व
क्या होगा मेरा मुस्तक़बिल
बस उड़ते रहें बेख़बर
अपनी शर्तों और पूर्वग्रहों
से कितना बिगाड़ लिया है
हमने अपने शुध्द,मासूम मन को
अपने आग्रहों से,
अपने अहंकार से
अपनी मनमानी से
जानते हैं कि हो जाना है
एकदिन अनंत में विलीन
तो भी सच से मुँह फ़ेर कर
हम अड़े हैं अपनी बात पर
आओ बेख़बर उड़ने का शऊर
पतंग से सीख लें.
Sunday, December 27, 2009
क्रिसमस पर मन को सुक़ून देते सदभावना के संदेश !

कल बड़ा दिन था. मेरे शहर के चर्च के बाहर वैसा ही उल्लास और उमंग नज़र आई जैसी दीपावली पर मंदिरों के बाहर और ईद के दिन मस्ज़िदों के बाहर नज़र आती है.
सजे धजे क्रिश्चियन भाई-बहन और उनकी उंगली थामें प्यारे बच्चों के चेहरे पर क्रिसमस की ख़ुशी साफ़ देखी जा सकती थी. इस बीच एक मित्र ने बताया कि मुंबई के चर्च के पादरी सिध्दि विनायक मंदिर जाकर गणपति के सम्मुख दीया प्रज्ज्वलित करेंगे और उसके बाद मंदिर के पुजारी चर्च जाकर तुलसी का पौधा रोपेंगे. मन रोमांचित हो गया ये बात सुनकर. दिल ने भीतर से कहा यही है तो हमारे देश की गंगा-जमनी तहज़ीब. इसी से तो जाना जाता है हमारा वजूद. इन बातों को लेकर मैं ख़ुश हो ही रहा था कि मोबाइल पर एस.एम.एस. आने शुरू हो गये. कुछ जाने पहचाने मित्रों के नाम देखे तो सहज ही जिज्ञासा हो आई कि भला क्रिसमस के दिन ये क्या कहना चाहते हैं. संदेश थे तो अंग्रेज़ी में लेकिन सभी चार-पांच संदेशों में मैरी क्रिसमस लिखा हुआ था. किसी किसी में भगवान यीशु की करूणा ज़िक्र भी था. मैसेज अच्छे तो थे ही लेकिन सबसे अच्छी बात यह थी कि भेजने वाले भी क्रिश्चियन नहीं थी और पानेवाला यानी मैं भी क्रिश्चियन नहीं....
ख़ैर उस वक़्त तो मैं मैसेज पढ़ कर अपने काम में लग गया लेकिन आज थोड़ी तसल्ली से उन्हें फ़िर पढ़ा तो सोचने लगा कि सदभावना की यह अभिव्यक्तियाँ कितनी भावपूर्ण है,कितनी आत्मीय है. अच्छा लगा कि हम दीगर धर्मों और तहज़ीबों का अनुसरण करने वाले भी दूसरे सप्रदाय के त्योहारों को अपना मानने लगे हैं.शायद यही समय की ज़रूरत भी है और धर्म-निरपेक्ष देश की संस्कृति भी. लेकिन साथ ही मानस में यह प्रतिप्रश्न भी उभरा कि ये एस.एम.एस महज़ कुछ भी भेजना है इसलिये तो नहीं भेज दिये गए हैं....ये सोचकर कि रोज़ रोज़ ही तो मित्रता,दिन शुभ हो या मैनेजमेंट के मैसेज भेजते हैं;चलो आज हैप्पी क्रिसमस ही सही. अगर यह कारण रहा हो तो सोचकर लगा कि हम भला ऐसा क्यों करते हैं. क्या ये सदभावना का दिखावा नहीं. यह बात भी मन में आई कि इन संदेशों को भेजने वाले मित्रों ने क्या किसी अपने क्रिश्चियन परिचित,पडौसी और मित्र को बड़े दिन की बधाई दी ? जितनी ख़ुशी संदेशो को प्राप्त कर हुई थी वह मन के प्रतिप्रश्नों से काफ़ूर हो गई....आप क्या सोचते हैं...मन में उथल-पुथल मची है तो सोचा आपसे बतियाकर जी हल्का कर लिया जाए.
बहरहाल ! दिल की गहराई से बड़े दिन की बधाई...
Thursday, November 26, 2009
आज है मुनव्वर राना और राजकुमार केसवानी का जन्मदिन.
सबसे पहले तो इन दोनो सुख़नवर की लम्बी उम्र की कामना करें.मुनव्वर राना और राजकुमार केसवानी को अलग-अलग इलाक़े के इंसान हैं लेकिन दोनो में एक समानता है कि ये अपनी शर्तों पर अपनी ज़िन्दगी बसर करते हैं.दोनों में ज़िन्दादिली एक स्थायी भाव है और मस्तमौला तबियत के धनी हैं,इंसानी तक़ाज़ों को कभी दरकिनार नहीं करते और जो भी काम करते हैं बड़ी ईमानदारी से करते हैं.

मुनव्वर राना का घर पूरा हिन्दुस्तान है.हम इन्दौरी भरम पाल लेते हैं कि इन्दौर उनका दूसरा घर है जबकि हक़ीकत यह है कि मुनव्वर भाई जहाँ जाते हैं अपना परिवार-दोस्त बना लेते हैं.उर्दू शायरी में रिश्तों को लेकर मुनव्वर भाई जो बातें कहीं हैं वे न केवल बेमिसाल हैं बल्कि एक लम्हा आपको अपनी ज़ाती ज़िन्दगी में झाँकने पर मजबूर भी करतीं हैं.दोस्त बनाने में मुनव्वर भाई का जवाब नहीं;और यक़ीनन वे दोस्ती निभाते भी हैं.अच्छा खाना मुनव्वर भाई की क़मज़ोरी है.वे कहते हैं ...जहाँ अच्छा खाना;वहाँ मुनव्वर राना.मुनव्वर भाई की सालगिरह पर उन्हीं की ग़ज़ल मुलाहिज़ा फ़रमाएँ:
हमारा तीर कुछ भी हो,निशाने तक पहुँचता है
परिन्दा कोई मौसम हो ठिकाने तक पहुँचता है
धुआँ बादल नहीं होता,कि बचपन दौड़ पड़ता है
ख़ुशी से कौन बच्चा कारख़ाने तक पहुँचता है
हमारी मुफ़लिसी पर आपको हँसना मुबारक हो
मगर यह तंज़ हर सैयद घराने तक पहुँचता है.

राजकुमार केसवानी की पहली पहचान अख़बारनवीस के बतौर है और दिसम्बर महीना नज़दीक़ आते ही राजभाई की पूछ-परख कुछ ज़्यादा ही हो जाती है क्योंकि यही वह पहला शख़्स है जिसने भोपाल गैस त्रासदी के लिये भारत सरकार को बहुत पहले चेताया था. राजकुमार केसवानी एक भावुक कवि भी हैं और उनकी रचनाओं में परिवेश और ज़िन्दगी के कई कलेवर नज़र आते हैं.वे दैनिक भास्कर के रविवारीय परिशिष्ट रस-रंग का सफल संपादन कर चुके हैं और देश के अख़बारों में हर हफ़्ते शाया होने वाले रविवासरीय पन्नों से रस-रंग को बहुत आगे निकाल चुके हैं.वे एक संजीदा इंसान इसलिये भी हैं कि हर तरह का वह संगीत जिसमें सुर की रूह मौजूद है राजभाई सुनना और गुनना पसंद करते हैं.स्वयं उनके निजी संकलन में कई बेमिसाल बंदिशें मौजूद हैं जिनमें फ़िल्म संगीत,ग़ज़ले और क्लासिकल रचनाओं का शुमार है.वर्ल्ड क्लासिक फ़िल्में भी राजभाई की कमज़ोरी रही हैं.सूफ़ी परम्परा के पुरोधा बाबा रूमी पर राजकुमार केसवानी के मजमुए में झर रहीं रूहानियत महसूस करने की चीज़ है. राजभाई की एक कविता आपके साथ बाँटना चाहता हूँ
बचपन में
मेरे पास
सिर्फ़ बचपन था
और वह
सबको
अच्छा लगता था
बुढ़ापे मे अब
मेरे पास
रह गया है
सिर्फ़ बचपना
और वह
किसी को
अच्छा नहीं लगता.
तो लीजिये दोस्तो,आज उर्दू-हिन्दी की शब्द-सेवा करने वाले दो प्यारे इंसानों को उनके जन्मदिन की बधाई देत हुए मैं अपनी बात को विराम देता हूँ.
बधाई....मुनव्वर राना....राजकुमार केसवानी.

मुनव्वर राना का घर पूरा हिन्दुस्तान है.हम इन्दौरी भरम पाल लेते हैं कि इन्दौर उनका दूसरा घर है जबकि हक़ीकत यह है कि मुनव्वर भाई जहाँ जाते हैं अपना परिवार-दोस्त बना लेते हैं.उर्दू शायरी में रिश्तों को लेकर मुनव्वर भाई जो बातें कहीं हैं वे न केवल बेमिसाल हैं बल्कि एक लम्हा आपको अपनी ज़ाती ज़िन्दगी में झाँकने पर मजबूर भी करतीं हैं.दोस्त बनाने में मुनव्वर भाई का जवाब नहीं;और यक़ीनन वे दोस्ती निभाते भी हैं.अच्छा खाना मुनव्वर भाई की क़मज़ोरी है.वे कहते हैं ...जहाँ अच्छा खाना;वहाँ मुनव्वर राना.मुनव्वर भाई की सालगिरह पर उन्हीं की ग़ज़ल मुलाहिज़ा फ़रमाएँ:
हमारा तीर कुछ भी हो,निशाने तक पहुँचता है
परिन्दा कोई मौसम हो ठिकाने तक पहुँचता है
धुआँ बादल नहीं होता,कि बचपन दौड़ पड़ता है
ख़ुशी से कौन बच्चा कारख़ाने तक पहुँचता है
हमारी मुफ़लिसी पर आपको हँसना मुबारक हो
मगर यह तंज़ हर सैयद घराने तक पहुँचता है.

राजकुमार केसवानी की पहली पहचान अख़बारनवीस के बतौर है और दिसम्बर महीना नज़दीक़ आते ही राजभाई की पूछ-परख कुछ ज़्यादा ही हो जाती है क्योंकि यही वह पहला शख़्स है जिसने भोपाल गैस त्रासदी के लिये भारत सरकार को बहुत पहले चेताया था. राजकुमार केसवानी एक भावुक कवि भी हैं और उनकी रचनाओं में परिवेश और ज़िन्दगी के कई कलेवर नज़र आते हैं.वे दैनिक भास्कर के रविवारीय परिशिष्ट रस-रंग का सफल संपादन कर चुके हैं और देश के अख़बारों में हर हफ़्ते शाया होने वाले रविवासरीय पन्नों से रस-रंग को बहुत आगे निकाल चुके हैं.वे एक संजीदा इंसान इसलिये भी हैं कि हर तरह का वह संगीत जिसमें सुर की रूह मौजूद है राजभाई सुनना और गुनना पसंद करते हैं.स्वयं उनके निजी संकलन में कई बेमिसाल बंदिशें मौजूद हैं जिनमें फ़िल्म संगीत,ग़ज़ले और क्लासिकल रचनाओं का शुमार है.वर्ल्ड क्लासिक फ़िल्में भी राजभाई की कमज़ोरी रही हैं.सूफ़ी परम्परा के पुरोधा बाबा रूमी पर राजकुमार केसवानी के मजमुए में झर रहीं रूहानियत महसूस करने की चीज़ है. राजभाई की एक कविता आपके साथ बाँटना चाहता हूँ
बचपन में
मेरे पास
सिर्फ़ बचपन था
और वह
सबको
अच्छा लगता था
बुढ़ापे मे अब
मेरे पास
रह गया है
सिर्फ़ बचपना
और वह
किसी को
अच्छा नहीं लगता.
तो लीजिये दोस्तो,आज उर्दू-हिन्दी की शब्द-सेवा करने वाले दो प्यारे इंसानों को उनके जन्मदिन की बधाई देत हुए मैं अपनी बात को विराम देता हूँ.
बधाई....मुनव्वर राना....राजकुमार केसवानी.
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हिन्दी
Friday, November 6, 2009
उड़ गया....कागद कारे करने वाला हँस अकेला !

आज सुबह आकाशवाणी समाचार में वरिष्ठ हिन्दी पत्रकार श्री प्रभाष जोशी के अवसान का समाचार सुना. यूँ लगा जैसे मालवा का एक लोकगीत ख़ामोश हो गया. उनके लेखन में मालवा रह-रह कर और लिपट-लिपट कर महकता था. नईदुनिया से अपनी पत्रकारिता की शुरूआत करने वाले प्रभाषजी के मुरीदों से बड़ी संख्या उनसे असहमत होने वालों की है. लेकिन वे असहमत स्वर भी महसूस करते रहे हैं कि पत्रकारिता में जिस तरह के लेखकीय पुरूषार्थ की ज़रूरत होती है; प्रभाषजी उसके अंतिम प्रतिनिधि कहे जाएंगे. आज पत्रकारिता में क़ामयाब होने के लिये जिस तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं ; प्रभाषजी उससे कोसों दूर अपने कमिटमेंट्स पर बने रहे. दिल्ली जाकर भी वे कभी भी मालवा से दूर नहीं हुए. बल्कि मैं तो यहाँ तक कहना चाहूँगा कि श्याम परमार, कुमार गंधर्व,प्रभाष जोशी और प्रहलादसिंह टिपानिया के बाद मालवा से मिली थाती को प्रभाषजी के अलावा किसी ने ईमानदारी से नहीं निभाया; यहाँ तक कि अब मालवा में रह कर पत्रकारिता,कला,कविता और संगीत से कमा कर खाने वालों ने भी नहीं. जनसत्ता उनके सम्पादकीय कार्यकाल और उसके बाद के समय में जिस प्रतिबध्द शैली में काम करता रहा है उसके पीछे कहीं न कहीं प्रभाषजी का पत्रकारीय संस्कार अवश्य क़ायम है. राहुल बारपुते जैसे समर्थ पत्रकार के सान्निध्य में प्रभाषजी ने अख़बारनवीसी की जो तालीम हासिल की उसे ज़िन्दगी भर निभाया. आज पत्रकारिता क्राइम,ग्लैमर और राजनीति के इर्द-गिर्द फ़ल-फूल रही है,कितने ऐसे पत्रकार हैं जो कुमार गंधर्व के निरगुणी पदों का मर्म जानते हैं,कितने केप्टन मुश्ताक अली या कर्नल सी.के.नायडू की धुंआधार बल्लेबाज़ी की बारीकियों को समझते हैं,कितने ऐसे हैं जो अपने परिवेश की गंध को अपने लेखन में बरक़रार रख पाते हैं; शायद एक-दो भी नहीं.राजनेताओं से निकटता आज पत्रकारिता में गर्व और उपलब्धि की बात मानी जाती है. प्रभाषजी जैसे पत्रकारों ने इसे हमेशा हेय समझा बल्कि मुझे तो लगता है कि कई राजनेता उनसे सामीप्य पाने के लिये लालायित रहे लेकिन जिसे उन्होंने ग़लत समझा ; ग़लत कहा...किसी व्यक्ति से तमाम विरोधों के बावजूद यदि प्रभाषजी को लगा कि नहीं उस व्यक्ति में कमज़ोरियों की बाद भी कुछ ख़ास बात है तो उसे ज़रूर स्वीकारा.अभी हाल ही में उन्होंने इंदिराजी की पुण्यतिथि पर दूरदर्शन के एक टॉक-शो में शिरक़त की थी और इंदिराजी की दृढ़ता और नेतृत्व -क्षमता की प्रशंसा की थी जबकि उन्हीं इंदिराजी को आपातकाल और उसके बाद कई बार प्रभाषजी ने अपने कागद-कारे में लताड़ भी लगाई थी.
बहरहाल...हिन्दी पत्रकारिता ही नहीं हिन्दी जगत में भी आज का दिन एक दु:ख भरे दिन के रूप में याद किया जाएगा क्योंकि हिन्दी की धजा को ऊंचा करने वाले प्रभाष जोशी आज हमारे बीच नहीं रहे हैं.....प्रभाष दादा क्या आप आज भी कुमार जी का यह पद सुन रहे हैं....उड़ जाएगा हँस अकेला.
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