Showing posts with label कविता. Show all posts
Showing posts with label कविता. Show all posts

Saturday, May 1, 2010

ले लो, ले लो झुमके अमलतास के


इन दिनों सुबह सैर पर निकल रहा हूँ तो रास्ते में जगह जगह अमलतास फूला हुआ है.
चटख़ रंगो वाले गुलमोहर की बहार भी छाई हुई है लेकिन अमलतास का शबाब कुछ और ही है. हरे पत्तों से लदा पेड़ तपती धूप में कब पीले झुमकों में तब्दील हो जाता है मालूम ही नहीं पड़ता. एक झूमर की शक्ल में कई झूमर लटके हैं अमलतास के. सिंथेटिक रंगों की दुनिया में रहने वाले हमारी नस्ल इस ख़ालिस पीलेपन को निहारने का वक़्त ही नहीं निकाल पाती है. सुबह के घुमन्तुओं में भी कुछ ही ऐसे मिले जो ठिठक कर अमलतास या गुलमोहर के नीचे खड़े हो जाएं और देखें तो कि कुदरत क्या खेल रच रही है. परमात्मा को देखा नहीं मैंने और न ही इस तरह की मान्यता भी है मन में लेकिन जब भी कु़दरत के इन करिश्मों को निहारता हूँ तो लगता है कि इन्हीं पेड़ों में बसा होगा वह.

अमलतास का एक फूल नहीं होता बल्कि पूरा एक कंदील पेड़ पर लटकता है.रात में पूर्णिमा के पूरे चाँद में अमलतास को देखा तो लगा जैसे किसी ने दीवाली की रात में पीले कंदील रोशन कर दिये हैं. तेज़ धूप में मेरे मालवा में दीगर दरख्तों को जहाँ झुरझुरी सी आ रही है और शाख़ें सूखी सी हैं वहीं अमलतास के पत्ते हरे कच्च हैं और फूल के इन झुमकों के तो क्या कहने.निसर्ग के लिये जिस तरह की बेपरवाही है और नई पीढ़ी में बेख़बरी का भाव है ऐसे में सोचता हूँ बहुत से पेड़ों के बीच ये अमलतास बड़ा वीराना और अकेला सा ही है . इसके झुमकों की ख़ास बास यह भी है कि वह बड़े हल्के वज़न के हैं और ज़रा सी हवा चलने पर झूमने लगते हैं .चूँकि ये झूमना भी दाएँ-बाएँ न होकर ऊपर-नीचे है तो उसमें एक ख़ास तरह की लयकारी दीखती है.

दिन में जैसे जैसे धूप बढ़ती है...अमलतास के झुमके कुछ और पीले होकर दमकने लगते हैं. इनके चटकीलेपन की वजह यह भी है कि फूलों के अनुपात में अमलतास के पत्ते भी नये-नकोरे और ज़्यादा हरे हरे हो गए हैं यूँ ये हरापन तो नैपथ्य में चला गया है और सर्वत्र फूलों का साम्राज्य ही नज़र आने लगता है. इस दौरान मुझे अमलतास कुछ इतराता नज़र आता है मानो आसपास के पेड़ों को संदेश देना चाहता हो कि मैं तो तुम्हारे मुक़ाबले ज़्यादा भरा-पूरा हूँ.हम ग्राफ़िक डिज़ाइनिंग वाले कांट्रास्ट रचने के लिये रंगों को एकाकार और विलग करते ही रहते हैं लेकिन क़ुदरत के सामने तो हमारा कम्प्यूटरी कांट्रास्ट क़मज़ोर ही दिखाई देता है.
इस अमलतास आख्यान को कविवर सरोजकुमार की कविता से विराम देते हैं;
अमलतास की रंगत का कितना अनूठा भान देते हैं न उनके शब्द:

बीत गए केशरिया
दिन पलाश के
ले लो, ले लो, झुमके अमलतास के

ओ पीपल,नीम, बड़,सुरजना
कौन जिसे नहीं है मुरझना ?
डलिया में दो दिन की
सौ दिन फूल के
कोई फ़िर क्यों मुरझे बिन हुलास के ?


झूल रहे चमकीले सौ-सौ फ़ानूस
इंक़लाब ? पीली तितलियों के जुलूस
सूरज के घोड़े बहके
ऐसी आग,
धूप निकल भागी है,बिन लिबास के


मौसम के हाथों पर मेहंदी के चित्र
धू धू दोपहरी,ये तपस्वी विचित्र
किसकी विरूदावलि के
स्वर्ण मालकौंस
कोई तो बतलावे, ये तलाश के
ले लो, ले लो, झुमके अमलतास के
(चित्र ख़ाकसार ने अपने मोबाइल से लिया है)

Thursday, November 26, 2009

आज है मुनव्वर राना और राजकुमार केसवानी का जन्मदिन.

सबसे पहले तो इन दोनो सुख़नवर की लम्बी उम्र की कामना करें.मुनव्वर राना और राजकुमार केसवानी को अलग-अलग इलाक़े के इंसान हैं लेकिन दोनो में एक समानता है कि ये अपनी शर्तों पर अपनी ज़िन्दगी बसर करते हैं.दोनों में ज़िन्दादिली एक स्थायी भाव है और मस्तमौला तबियत के धनी हैं,इंसानी तक़ाज़ों को कभी दरकिनार नहीं करते और जो भी काम करते हैं बड़ी ईमानदारी से करते हैं.



मुनव्वर राना का घर पूरा हिन्दुस्तान है.हम इन्दौरी भरम पाल लेते हैं कि इन्दौर उनका दूसरा घर है जबकि हक़ीकत यह है कि मुनव्वर भाई जहाँ जाते हैं अपना परिवार-दोस्त बना लेते हैं.उर्दू शायरी में रिश्तों को लेकर मुनव्वर भाई जो बातें कहीं हैं वे न केवल बेमिसाल हैं बल्कि एक लम्हा आपको अपनी ज़ाती ज़िन्दगी में झाँकने पर मजबूर भी करतीं हैं.दोस्त बनाने में मुनव्वर भाई का जवाब नहीं;और यक़ीनन वे दोस्ती निभाते भी हैं.अच्छा खाना मुनव्वर भाई की क़मज़ोरी है.वे कहते हैं ...जहाँ अच्छा खाना;वहाँ मुनव्वर राना.मुनव्वर भाई की सालगिरह पर उन्हीं की ग़ज़ल मुलाहिज़ा फ़रमाएँ:

हमारा तीर कुछ भी हो,निशाने तक पहुँचता है
परिन्दा कोई मौसम हो ठिकाने तक पहुँचता है

धुआँ बादल नहीं होता,कि बचपन दौड़ पड़ता है
ख़ुशी से कौन बच्चा कारख़ाने तक पहुँचता है

हमारी मुफ़लिसी पर आपको हँसना मुबारक हो
मगर यह तंज़ हर सैयद घराने तक पहुँचता है.





राजकुमार केसवानी की पहली पहचान अख़बारनवीस के बतौर है और दिसम्बर महीना नज़दीक़ आते ही राजभाई की पूछ-परख कुछ ज़्यादा ही हो जाती है क्योंकि यही वह पहला शख़्स है जिसने भोपाल गैस त्रासदी के लिये भारत सरकार को बहुत पहले चेताया था. राजकुमार केसवानी एक भावुक कवि भी हैं और उनकी रचनाओं में परिवेश और ज़िन्दगी के कई कलेवर नज़र आते हैं.वे दैनिक भास्कर के रविवारीय परिशिष्ट रस-रंग का सफल संपादन कर चुके हैं और देश के अख़बारों में हर हफ़्ते शाया होने वाले रविवासरीय पन्नों से रस-रंग को बहुत आगे निकाल चुके हैं.वे एक संजीदा इंसान इसलिये भी हैं कि हर तरह का वह संगीत जिसमें सुर की रूह मौजूद है राजभाई सुनना और गुनना पसंद करते हैं.स्वयं उनके निजी संकलन में कई बेमिसाल बंदिशें मौजूद हैं जिनमें फ़िल्म संगीत,ग़ज़ले और क्लासिकल रचनाओं का शुमार है.वर्ल्ड क्लासिक फ़िल्में भी राजभाई की कमज़ोरी रही हैं.सूफ़ी परम्परा के पुरोधा बाबा रूमी पर राजकुमार केसवानी के मजमुए में झर रहीं रूहानियत महसूस करने की चीज़ है. राजभाई की एक कविता आपके साथ बाँटना चाहता हूँ

बचपन में
मेरे पास
सिर्फ़ बचपन था
और वह
सबको
अच्छा लगता था

बुढ़ापे मे अब
मेरे पास
रह गया है
सिर्फ़ बचपना
और वह
किसी को
अच्छा नहीं लगता.


तो लीजिये दोस्तो,आज उर्दू-हिन्दी की शब्द-सेवा करने वाले दो प्यारे इंसानों को उनके जन्मदिन की बधाई देत हुए मैं अपनी बात को विराम देता हूँ.
बधाई....मुनव्वर राना....राजकुमार केसवानी.

Monday, June 8, 2009

आइये कविवर ओम व्यास के स्वास्थ्य लाभ की कामना करें



वह मालवा का ऐसा सशस्त काव्य हस्ताक्षर है जिसने इन दिनों हिन्दी काव्य मंचों को अपनी अनूठी कहन और शिल्प से ठहाकों से लबरेज़ कर रखा है. एक विशष्ट स्वांग और अभिव्यक्ति का कवि पं.ओम व्यास ओम भोपाल के एक निजी नर्सिंग होम में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्षरत है. जब मैं यह बात लिख रहा हूँ तब तक पूरे देश को मालूम पड़ चुका है कि विदिशा (म.प्र) से एक कवि-सम्मेलन से कार द्वार लौटते हुए देश के तीन कवि;ओमप्रकाश आदित्य,नीरज पुरी और लाड़सिंह गुर्जर एक भीषण सड़क दुर्घट्ना में ८ जून की अलसुबह काल कवलित हो गए. प.व्यास और युवा कवि जॉनी बैरागी इसी कार में थे. कवि अशोक चक्रधर,विनीत चौहान और प्रदीप चौबे भोपाल में व्यास और बैरागी की देखरेख में लगे रहे.इधर इन्दौर,उज्जैन,रतलाम,खण्डवा,भोपाल, जैसे प्रदेश के दीगर शहरों के अलावा देश भर के काव्य-प्रेमियों के बीच इस ह्रदयविदारक घटना का समाचार मोबाइल फ़ोन्स और एस.एम.एस के ज़रिये फ़ैलता रहा. इसी सुबह कला-प्रेमियों को रंगकर्मी हबीब तनवीर के इंतक़ाल की ख़बर भी मिली थी.
पं.ओम व्यास ओम ने विगत पाँच वर्षों में अपनी हास्य कविताओं से न केवल देश में वरन विदेशों ख़ासकर अमेरिका के हिन्दी काव्य-प्रेमियों के बीच अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है. वे अपने परिवेश,परिवार और संबंधों से निराले काव्य-बिम्ब तलाशने में माहिर रहे हैं.जैसे मज़ा ही कुछ और है शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ देखिये:

दाँतों से नाख़ून काटने का
छोटों को ज़बरद्स्ती डॉटनें का
पैसे वालों को गाली बकने का
मूँगफ़ली के ठेले से मूँगफ़ली चखने का
कुर्सी पर बैठकर कान में पेन डालने का
और रोडवेज़ की बस की सीट से स्पंज निकालने का
मज़ा ही कुछ और है


कभी नहीं उन्वान से एक रचना में पं.व्यास कहते हैं:
साले की बुराई
शक्की की दवाई
उधार प्रेमी को अपने दोस्त से मिलाना
पत्नी को अपनी असली इनकम बताना
कुत्ते के नवजात पिल्ले को सहलाना
और पहलवान की बहन से इश्क़ लड़ाना
कभी नहीं-कभी नहीं


हास्य कविताओं के अलावा माँ और पिता शीर्षक से रची अपनी कविता से पं.ओम व्यास ने पूरे देश के कविता प्रेमियों को लगभग सिसकने पर विवश किया है.
बानगी देखें:

माँ
चिन्ता है,याद है,हिचकी है
बच्चे की चोट पर सिसकी है
माँ चूल्हा,धुँआ,रोटी और हाथों का छाला है
माँ ज़िन्दगी की कड़वाहट में अमृत का प्याला है
माँ त्याग है,तपस्या है,सेवा है
माँ फूँक से ठंडा किया हुआ कलेवा है


पिता
रोटी है,कपड़ा है,मकान हैं
पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान हैं
पिता से ही बच्चों के ढ़ेर सारे सपने हैं
पिता हैं तो बाज़ार के सब खिलौने अपने हैं


आज जब हास्य के नाम पर कविता लतीफ़े में तब्दील होती जा रही है,ओम व्यास जैसे कवियों ने अपने समर्थ क़लम से काव्य की आन में बढोत्तरी की है. पं.ओम व्यास के लिये चिकित्सकों का कहना है कि आगामी 24 घंटे उनके लिये बेहद चुनौतीपूर्ण हैं.आइये हम सब मिल कर प्रार्थना करें कि इस यशस्वी और लाड़ले कवि के सर से ये ख़तरा भी टल जाए. प.ओम व्यास ने घर-घर में हँसी बाँटी है;लाखों मुरीदों की दुआएं उनके साथ हैं.

हाँ बात ख़त्म करते करते बता दूँ कि पं.ओम व्यास बी.एस.एन.एल.में कार्यरत हैं और उज्जैन उनका शहर है लेकिन पूरे देश में उनके मित्रों और चाहने वालों की लम्बी फ़ेहरिस्त है.इन दिनों ओम भाई कविता पाठ शुरू करने के पहले दाद बटोरने के लिए एक नवेला रूपक गढ़ रहे हैं.वे कहते हैं मैं आपके शहर में काव्यपाठ से आने के पहले उज्जैन के विश्व्व प्रसिध्द महाकाल मंदिर गया था . वहाँ भगवान महाकाल से भेंट हो गई.तो मुझे बोले ओम जो तेरे कविता पाठ में सुमड़ा जैसा बैठा रहे और दाद न दे तो उज्जैन आकर मुझे सिर्फ़ उसके शर्ट का रंग बता देना, बाक़ी मैं देख लूंगा.ऐसा कहते ही पं.ओम व्यास की बात पर तालियों और ठहाकों की धूम मच जाती है.

महाकाल को काल को टालने वाला देव कहा गया है,आइये उन्हीं महाकाल भगवान से प्रार्थना करें कि अपने नगर के इस युवा कवि के सर से काल को टालें और पूरे व्यास परिवार की ख़ुशियों को लौटा दें.

Wednesday, March 11, 2009

आज फ़िर याद आ गईं दिव्यमयी महादेवीजी



सरस्वती का साक्षात स्वरूप मानीं जाने वालीं हिन्दी कविता की पूजनीय हस्ताक्षर महादेवी वर्मा का जन्मदिन होली के दिन ही आता है. 1984 में लायन्स क्लब की युवा इकाई लियो क्लब के लिये महादेवीजी को इन्दौर न्योता था. लोक साहित्य के जाने माने लेखक दादा रामनारायण उपाध्याय के ज़रिये हमें मालूम पड़ा कि महादेवी जी खण्डवा आ रहीं हैं. पहुँच गए हम उनसे मिलने . हिन्दी के वरिष्ठ कवि श्रीयुत श्रीकांत जोशी के निवास पर महादेवी जी से मुलाक़ात हुई. नीले किनार वाली सूती सफ़ेद साड़ी ,आँखों पर काले मोटे फ़्रेम का चश्मा और पाँवों में साधारण सी स्लीपर. स्वर ऐसा खरज में डूबा हुआ कि बोलें तो लगे कि पाताल में से गूँज रही है ये आवाज़.पूछने लगीं क्यों बुलाना चाहते हैं इन्दौर.मैंने बताया युवाओं का संगठन है हमारा आप आएँगी तो प्रेरणा मिलेगी कुछ नया करने की. ठहाका लगाकर बोलीं मेरे लिये समय होगा आप सबके पास.हाँ कहने पर प्रसन्न हुई. आने का आश्वासन दे दिया.

उन दिनों न तो मोबाइल था न एस.टी.डी., इन्दौर से इलाहाबाद ट्रंककॉल मिलाना पड़ता था. मेरे मित्र आदित्य बस इसी काम मे लगे रहते.मालूम पड़ा वे हिंदी साहित्य समिति के आयोजन में शिरक़त के लिये इन्दौर आने वालीं है. उसके पहले भोपाल पहुँचेंगी. हम उन्हें आग्रह करने भोपाल पहुँच गए. भारत भवन में कार्यक्रम था. सीढ़ियों से नीचे उतरनें लगीं .मैं और इन्दौर से आए सारे साथी पीछे पीछे. डॉ.शिवमंगल सिंह सुमन ने एहतियातन हाथ थाम लिया महादेवीजी और बोले दीदी सम्हल कर. कहीं गिर न पडें ! महादेवीजी ने स्फ़ूर्त जवाब दिया मैं अब गिर भी गई तो क्या सुमन ( और हमारी और मुड़ कर इशारा करते हुए बोलीं) सम्हालना तो इस पीढ़ी को पड़ेगा ये न गिर न पड़े.

दो दिन बाद महादेवीजी इन्दौर आईं.लेकिन उसके पहले भोपाल में एक हादसा हो गया. सर्किट हाउस में महादेवीजी गिर पड़ीं और पैर में सूजन आ गई.भीषण पीड़ा ने घेर लिया महादेवीजी को लेकिन वादे के मुताबिक प्रेमचंद स्मृति प्रसंग में इन्दौर आईं.अमृत राय भी साथ में थे उस कार्यक्रम में.हमें इजाज़त दे दी थी सो हमने सैकड़ों निमंत्रण पत्र बाँट कर महादेवीजी की सभा को प्रचारित किया. रात आठ बजे कार्यक्रम था. सात बजे आयोजन स्थल पर फ़ोन आया कि महादेवीजी ने पैर की पीड़ा के कारण हमारे कार्यक्रम में आने से असमर्थता प्रकट की है. हम सब युवा साथियों को तो जैसे काटो तो ख़ून नहीं.तक़रीबन तीन – चार हज़ार श्रोता सदी की इस समर्थ काव्यमूर्ति से रूबरू होने को बेसब्र. मैं अपने साथी के साथ हिन्दी साहित्य समिति के आयोजन में पहुँचा. जैसे ही महादेवीजी मंच से उतरी और कार की तरफ़ आईं तो मैने कहा महादेवीजी कृपापूर्वक आयोजन स्थल पर चलिये न. उन्होंने कहा मेरा पैर साथ नहीं दे रहा. जब बात नहीं बनती दिखी तो मैंने अपना आख़री प्रस्ताव उनके सामने रखा और कहा चलिये संबोधन मत दीजिये. आयोजन स्थल पर मौजूद हज़ारों श्रोताओं को दर्शन तो दे दीजिये. पूछने लगीं क्या वाक़ई लोग आ गए होंगे. मैंने बताया चल कर देख लीजिये. कितनी दूर है आपका आयोजन स्थल उन्होंने पूछा. मैने कहा बमुश्किल पाँच मिनट के अंतराल पर. कहने लगी बोलूंगी नहीं. मैने कहा आप बस चल कर दर्शन दे दीजिये.वे राज़ी हो गईं.

आयोजन स्थल पर कार आई. महादेवीजी पिछली सीट पर बैठीं है. वरिष्ठ कवि श्रीयुत बालकवि बैरागी को हमने आयोजन की भावभूमि रखने के लिये आमंत्रित किया था. खुले मैदान में था वह कार्यक्रम . चारों तरफ़ कनातें लगीं हुईं थी. हमने एक पूरी कनात हटा दी और कार को मंच के ठीक सामने ले आए. हज़ारों लोगों नें तालियाँ बजा कर महादेवीजी का स्वागत किया. मैं और बालकविजी खिड़की के पास आए और हाथ जोड़ कर कहा मंच पर चलेंगी महादेवीजी. वे बच्चे सी तुनक कर बोलीं बात यहाँ तक आने की हुई थी मंच पर जाने की नहीं.मैंने मन में सारे आराध्य मनाते हुए उनसे कहा ; महादेवीजी एक बात कहूँ यदि आप इजाज़त दें ? कहो . मैने विनम्रता से कहा महादेवीजी मंच पर मत चलिये, क्या यहाँ आपकी कार में माइक ला दें तो संबोधित करेंगी.निवेदन करते हुए मेरे माथे पर पसीना आ रहा था. जनता एकदम ख़ामोश और स्तब्ध और जानने को बेसब्र कि हो क्या रहा है आख़िर . महादेवीजी ने कहा लाओ माइक लाओ , बोलूँगी लेकिन सिर्फ़ पाँच मिनट. हम सारे युवा साथियों को तो जैसे मनचाही मुराद मिल गई. बालकविजी ने प्रस्तावना रखी और महादेवीजी की पीड़ा का क़िस्सा बयान किया. डेली कॉलेज नाम के प्रतिष्ठित स्कूल के बच्चों ने स्वागत गीत गाया. हाँ बता दूँ कि महादेवीजी बचपन इसी डेली कॉलेज परिसर में बीता जहाँ उनके पिता प्राध्यापन के लिये रहे थे. गीत समाप्त होते ही ड्रायवर की सीट पर माइक रखा गया और महादेवीजी ने अपना संबोधन देते हुए कहा था कि समाज में साहित्यकार की ज़िम्मेदारी ज़्यादा बड़ी है. उसे सोचने के शऊर दिया है भगवान ने. महादेवीजी जब बोल रहीं थी तब पूरे माहौल में गरिमा और अनुशासन देखने लायक़ था.

आज इस बात को तक़रीबन पच्चीस बरस बीत गए. उसके बाद कई बड़े – छोटे आयोजन से जुड़ने और उन्हें संयोजित करने का मौक़ा आया लेकिन सन 1984 की वह शाम भुलाए नहीं भूलती. आज फ़िर स्मृति के तहख़ाने से वह तस्वीर बाहर आ गई तो सोचा चलिये बहुत दिनों बाद हिन्दी साहित्य की इस वरेण्य सारस्वत प्रतिमा का वंदन करते हुए यह वाक़या आपसे साझा कर लिया जाए.


चित्र में महादेवीजी प्रमुख हिन्दी समाचार पत्र नईदुनिया बाँचते हुए. साथ में ख़ाकसार है.

Thursday, July 17, 2008

कविता में हमेशा अपने अवसाद को उड़ेलने वाले अशोक वाजपेयी.



पिछले सप्ताहांत में देश के जाने माने कवि,आलोचक,संस्कृतिकर्मीं और ललित कला अकादमी के अध्यक्ष श्री अशोक वाजपेयी माँडू प्रवास पर मालवा में थे.संस्कृति प्रशासक के रूप में अशोकजी ने अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है.उनकी कार्यशैली को लेकर हमेशा विलाप होता रहा है लेकिन वे हैं अपने तरीक़े से काम किये जाते हैं.लोकोक्ति सी बन गई है कि जिस दिन अशोक वाजपेयी का एक आलोचक पैदा होता है उसी दिन उनके चार प्रशंसक भी पैदा हो जाते हैं.अलमस्त तबियत के अशोक वाजपेयी तनाव के क्षणों में भी ठहाका लगाते देखे जा सकते हैं जो उनकी देहभाषा का
स्थायी भाव बन गया है.

एक समर्थ कवि के अलावा रंगकर्मे,शास्त्रीय संगीत,चित्रकारी,विश्व-कविता और नृत्य पर उनकी गहरी सूझ हमेशा चौंकाती है. यहाँ माँडू में भी उन्होने देश के जाने माने चित्रकारों के साथ तीन दिन बिताए और भीगते माँडू के शिल्प (माँडू के चित्र भी इसी ब्लॉग पर आप शीघ्र ही देखेंगे.इसी दौरान राज एक्सप्रेस के कला संवादताता और मित्र पत्रकार चंद्रशेखर शर्मा ने अशोक जी से मुख़्तसर सी बातचीत की;यहाँ जस की तस रख रहा हूँ उसे.-संप.




बात भारत भवन से शुरू करेंगे। बताइए, आपकी निगाह में उसकी दुर्दशा के लिए कौन ज़िम्मेदार है?

मेरे हिसाब से इसके लिए तीन शक्तियॉं ज़िम्मेदार हैं। एक, मध्यप्रदेश की राजनीति। चाहे वो कांग्रेसी हों या भाजपाई, दोनों इस मामले में राजनीति से ऊपर उठकर सोचने की हिम्मत नहीं कर पाए। दूसरी है नौकरशाही, जो कला एवं संस्कृति के प्रति असंवेदनशील सिद्ध हुई और तीसरी है व्यापक समाज का निर्लिप्त भाव। इस मामले में समाज को आवाज़ उठाने की ज़रूरत थी, जो कि नहीं उठाई गई। (ठीक फुहारों की तरह उनके शब्द भी हौले-हौले और झूलते-से कानों में उतर रहे थे, भ्रम में डालने वाले अंदाज़ में कि कहीं कविता तो नहीं?)

क्या कारण है कि कवि को कविता छोड़कर आलोचना का रुख करना पड़ा?

नहीं, नहीं, कविता को मैंने छोड़ा नहीं है। मेरा ताज़ा वाला काव्य संग्रह तो अभी कुछ समय पहले ही आया है। इसके अलावा मेरे अभी तक कुल १३ काव्य संग्रह आ चुके हैं और जितने भी मेरे हम उम्र कवि हैं, उनमें से किसी के भी इतने काव्य संग्रह नहीं आए। रही बात आलोचना की, तो वे शुरू से कर रहा हूँ। छियासठ में मेरा पहला काव्य संग्रह आया था और सत्तर में आलोचना की मेरी पहली पुस्तक आ गई थी। सो, मैं ४५ साल से आलोचक और ५० साल से कवि हूँ, केवल पांच साल का तो फ़र्क है। फिर मैंने केवल साहित्य की आलोचना नहीं की, संगीत, नृत्य और कला की आलोचना भी की और जिस पैमाने पर की, उस पैमाने पर किसी और ने नहीं की। उसी का प्रतिफल है कि बुनियादी तौर पर साहित्यकार होने के बावजूद मुझे ललित कला अकादमी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। (तर्क एकदम से चितेरा हो जाता है।)

अच्छा ये बताइए कि आप तो बड़े सरकारी अफ़सर भी रहे, क्या कभी आपके अफ़सर ने आपके कवि को कोई नफ़ा-नुकसान पहुँचाया या वाइसेवरसा ?

बात ये है कि अव्वल तो मैंने दोनों को हमेशा भरसक अलग-अलग रखा, फिर कवि तो अफ़सर का क्या नुकसान करता, उलटे अफ़सर ज़रूर कवि का नुकसान कर सकता था, लेकिन मैं इस मामले में सतर्क और चौकन्ना रहता था। दरअसल ये मेरे निंदकों की उड़ाई हुई है कि मैं अफ़सर-कवि रहा, जबकि हक़ीक़त इससे ठीक उलटी है। (सहजता बरक़रार है)

ये भी कहा जाता है आप अभी मुख्यधारा के कवियों में शुमार नहीं हैं।



मुख्धारा में न रहे न सही, अपनी धारा में तो रहे। इसका न कोई क्लेश है, न संताप है और सही बात तो यह है ऐसी आकांक्षा कभी रही भी नहीं।

एक कवि होने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ या चीज़ें क्या होती हैं?


इसके लिए तीन चीज़ें चाहिए होती हैं। एक, भाषा से खेलने का उत्साह। दूसरा, अकेले पड़ जाने से घबराहट का अभाव, यानी एकांत चाहिए होता है और तीसरा, है कविता कोई आवरण नहीं है कि उसे ओढ़कर सच्चाई को उससे ढांप लें।

ख़ुद को कविता में कैसे व्यक्त करना चाहेंगे?


मैं बाहर से हंसमुख, अंदर से उदास और कविता में हमेशा अपने अवसाद को उड़ेलता हुआ व्यक्ति हूँ।

Sunday, July 6, 2008

शहर को चलाना है;सियासत को नहीं;रहम खाओ-सियासत न चलाओ

कर्फ़्यू के साये में बेहोश मेरे प्यारे शहर के दिन-रात
इसकी लय और गति को बाधित कर रहे हैं.बच्चे,बूढ़े
हिन्दू,मुसलमान,बड़े –छोट,अमीर-ग़रीब...सब दुआ कर रहे
हैं अरमानों का ये शहर सियासत से मुक्त हो कर अपने रंग
में आ जाए.मेरी बात पढ़ते पढ़ते आपको लगे मैं कि मैं ठीक कह
रहा हूँ तो गुज़ारिश है आपसे कि अपनी तमाम प्रार्थनाओं
में मेरे दुलारे शहर को भी शरीक कर लें.


ख़ून चलेगा ,पत्थर चलेगा
सियासत न चलाओ

गोली चलेगी,ज़ख़्म चलेंगे
सियासत न चलाओ

इन्तज़ार चलेगा,भूख चलेगी
सियासत न चलाओ

कर्फ़्यू चलेगा,पुलिस चलेगी
सियासत न चलाओ

रोना चलेगा,आँसू चलेंगे
सियासत न चलाओ

कड़वा चलेगा,तल्ख़ी चलेगी
सियासत न चलाओ

दूरी चलेगी,तनाव चलेगा
सियासत न चलाओ

ख़ामोशी चलेगी,भाषण चलेंगे
सियासत न चलाओ

झूठे वादे चलेंगे,आहें चलेंगी
सियासत न चलाओ

शहर चलेगा,सियासत न चलेगी
रहम खाओ, सियासत न चलाओ

इन्दौरनामा और मोहल्ला पर भी देखें मेरे शहर और मेरे दु:ख के शब्द चित्र

इन्दौरनामा में जारी 'ये सिर्फ़ एक शहर नहीं ; इंसानियत की आवाज़ है' शीर्षक की कविता को नईदुनिया और
मोहल्ला मे जारी 'ये किसका लहू है कौन गिरा' शीर्षक की कविता को दैनिक भास्कर ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है।
इस प्रकाशन के लिये दोनो प्रकाशनों और मोहल्ला के अविनाश भाई का शुक्रिया अदा करता हूँ।