
आज विश्व-रंगमंच दिवस है। मेरे शहर इन्दौर के दो तीन अख़बारों ने हिन्दी नाटक को लेकर कई प्रश्न उठाए हैं.लेकिन एक बात तो कोई करना ही नहीं चाहता. हिन्दी नाटक की सबसे बड़ी परेशानी है दर्शक.जी हाँ हुज़ूर आप-हम.एक तो हम नाटक देखना नहीं चाहते ....और देखना भी चाहते हैं तो बिना पैसा चुकाए. हिन्दी नाटक न फ़ूलने-फ़लनेके कुछ ख़ास कारणों की तरफ़ आज तो कम से कम ध्यान जाना ही चाहिये......
-समकालीन हिन्दी नाटक आज रूंपातर पर जी रहा है.....गुजराती और मराठी में जैसा नया लेखन हो रहा है वैसा हिन्दी में हो ही नहीं रहा। अब सर्वेश्वरदयाल सक्सैना,मणि मधुकर,रमेश मेहता,मुद्रा राक्षस या मोहन राकेश को लेकर हम कब तक हिन्दी नाटक की डुगडुगी बजाएंगे.
-हमने पिछले दो दशकों में हिन्दी नाटक को गिरीश कर्नाड,ब.व..कारंत,विजय तेंडुलकर,बादल सरकार और विमल मित्र के बूतेपर बहुत खींच लिया....अब अगर हिन्दी नाटक को नई उम्र के दर्शक चाहिये तो नये सोच , परिवेश और समसामयिक स्थितियोंके नज़रिये से नाटक लिखे जाने चाहियें.
-क्या आप जानते हैं कि मराठी में लगभग हर महीने एक नया नाटक लिखा जा रहा है और दो नये नाटक मंचन के लियेतैयार हैं।
-मराठी/ गुजराती रंगमंच पर काम करने वाले कलाकार सिर्फ़ नाटक से जीविकोपार्जन कर पा रहे हैं....हिन्दी में ऐसी स्थिति बन ही नहीं पा रही।हिन्दी रंगकर्मी,टी।वी।सीरियल्स,इश्तेहार और फ़िल्म में काम किये बिना 'सरवाईव' ही नहीं कर पा रहा।जो इज़्ज़त,पैसा,वैभव और नाम मराठी/गुजराती/बांग्ला निर्देशक को मिलता है वह हिन्दी में लगभग गुम सा हो चला है...इसीलिये आपको हिन्दी नाटकों के निर्देशक अभिनय भी करते मिल जाएंगे।
-नाटक (मंच से परे) प्रबंधक जैसी कोई ची़ज़ हम हिदी वाले पैदा ही नहीं कर पाए। अभिनेताओं से ही चाय-पिलाने,खाना मंगवाने,प्रॉपर्टीज़ या वेशभूषा की जुगाड करने और तो और टिकिट बेचने का काम भी करवा लिया जाता है.....दीगर क्षेत्रों में इसके लिये ख़ास लोग होते हैं जो सिर्फ़ या तो अभिनय करते हैं या ड्रामा मैनेजमैंट देखते हैं।
- हिन्दी नाटकों के परिदृष्य को देखें तो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (रानावि) को छोड़कर कोई ऐसा दूसरा संस्थान नहीं जो नए ख़ून को तैयार कर रहा हो....मराठी और गुजराती में ये स्थिति है कि वहाँ पर नियमित रूप से कार्यशालाएँ हो रहीं हैं,अभिनय सिखाने वाले वरिष्ठ रंगकर्मी,अभिनेता अभिनय/स्वर अभिनय की क्लासेस ले रहे हैं और रंगकर्मियों की नई जमाततैयार कर रहे हैं.....सिखाने वाले भी कमा रहे है और सीखने वालों को भी लाजवाब मशवरे मिल रहे हैं।
-शबाना आज़मी,राज बब्बार,जया बच्चन,अनुपम खेर,शत्रुघ्न सिन्हा,राकेश बेदी,सतीश शाह,परेश रावल,नसीरूद्दीन शाह सेलेकर राजपाल यादव , मनोज जोशी (इन दोनो के नाटक का एक चित्र भी साथ दे रहा हूँ) तक की पीढ़ी के कलाकार जिन स्क्रिप्ट्स को लेकर हिन्दी रंगमंच पर अवतरित हुए हैं वे ज़्यादातर हिन्दी धारावाहिकों या फ़िल्मों से प्रभावित रही हैं,नतीजा ये कि जब तक प्रोड्यूसर को बुकिंग मिल रही है / जब तक सितारा कलाकारों की डेटस मिल रहीं हैं तब तकनाटक है वरना फ़िर वही ढ़ाक के तीन पात।
-मराठी / गुजराती की बात बार बार इसलिये कर रहा हूँ या इन भाषाओं के रंग आंदोलन की बात इसलिये कर रहा हूँ क्योंकिइनकी प्रस्तुतियों पर एक नज़दीकी नज़र रहती है मेरी और मेरे कुछ रंगकर्मी मित्र इन ज़ुबानों की पेशकश में शिरक़त कर रहे हैं सो फ़ीडबैक मिलता रहता है।
-मराठी / गुजराती नाटकों के बारे में आपको जानकर हैरत होगी कि नये निर्देशक नये की बाक़ायदा खोज करते हैं....यदि कोई क़ाबिल लेखक मिल जाता है तो नाटक के कथानक पर रात-दिन चर्चाएँ करते हैं/मशवरे करते हैं औरसाथ बैठकर सीन दर सीन नाटक लिखते है।लिखते वक़्त ख़ासतौर पर नई पीढ़ी के रंग-दर्शकों का ध्यान रखा जाता है.
-मराठी नाटकों की प्रस्तुति की तो बात ही निराली है....सुन कर नाटके की ये अंतर्कथाएँ भी एक कथानक से कम नहीं लगतीं...जैसे पिछले दिनों एक नाटक सही रे सही चर्चाओं में रहा ...इसी की बात करें....सही रे सही के लिये वरिष्ठ दर्शक (सीनियर सीटिज़न)कैसे आकर्षित किये जाएँ इसके लिये सभागार की टिकिट खिड़की से हटकर चौपटी पर सुबह घुमने वाले वरिष्ठ नाट्यप्रेमियों के लिये एक स्टॉल चौपाटी पर सुबह पाँच बजे से ही लगा दिया जाता था। दोपहर में महिलाएँ ज़्यादा फ़ुरसत में होतीं हैं अत: एकविशेष शो महिलाओं के लिये ही किया गया जिसमें पुरूषों को प्रवेश वर्जित था. मज़ा देखिये जिस दिन ये शो था उस दिन भारत पाकिस्तान का वन डे क्रिकेट मैच था...आयोजकों को संशय था ; न जाने क्या होगा.लेकिन दाद देनी होगी मराठी रंगप्रेम की .....शो हाऊस फ़ुल.
खैर आप भी कहेंगे.....हिन्दी वाला होकर मुझे दूसरे की कटोरी में ज़्यादा ही घी नज़र आ रहा है ...लेकिन क्या करूं हिन्दी रंगकर्म की दुर्दशा देख दिल रो उठता है। ऐसा लगता है ओम शिवपुरी,सुधा शिवपुरी,अब्राहिम अल्काज़ी,दिनेश ठाकुर,सत्यदेव दुबे जैसे महान रंगकर्मियों का अवदान फ़िज़ूल ही चला जाएगा क्योंकि हम अपनी विरासत को बचाते हुएकुछ नया नहीं गढ़ सके तब तक हम हमारी संस्कृति और परंपरा के साथ न्याय कैसे कर पाएँगे.
क्या एक दिन विश्व रंगमंच दिवस मना लेने......कुछ तक़रीरें करने और कुछ वक्तव्य उछाल देने से हिन्दी रंगकर्म बच सकेगा.मुझे लगता है हम हिदी वालों को बात कम करनीं चाहिये......नाटक ज़्यादा.......आप क्या सोचते हैं ?