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Monday, December 31, 2007

कैलेण्डर की मुस्कुराहट के लिये !


साल तो बीतेगा ही

दिन,हफ़्ते और घंटे भी


कोशिश करें की न बीते मनुष्यता,

जज़बात,भावनाएँ और संवेदनशीलता


कहने को एक तारीख़

आएगी नई सी


लेकिन मैं जानता हूँ कि

कोई रूपांतरण न कर पाएगी बेचारी


कितनी बेबस है न तारीख़

उससे मनुष्य चलता है

ऐसा वह सोचती है

लेकिन मनुष्य चलाने लगा है अब उसे


कैलेण्डर में बीतती तारीख़ से कोई सबक़ नही लेता

कि हम भी तो बीत रहे हैं इसके साथ


सबके लिये यह जोड़ - घटाव का

सिलसिला जो ठहरा


जानते नहीं कि हम जोड़ने में

कितना घट गए हैं


कितने छोटे हो गए हैं

यह छोटापन कुछ कम कर सकें

तो शायद हम पर

नये साल का कैलेण्डर मुस्कुराने लगे