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Saturday, November 3, 2007

देखना दीवाली पर इस बार ....नहीं मिलेंगे संस्कार !

मिलेगा मोबाईल

मिलेगा लैपटाप

कपड़े टीपटाप



हज़ारों की ज्वैलरी के वारे न्यारे

नये फ़र्नीचर के नज़ारे

ग्रीटिंग कार्ड के डिज़ाइन

ड्रायफ़्रूट्स,मिठाईयाँ,नमकीन ढ़ेर सारे



मिलेगी रोशनी चमकदार
गिफ़्टस का पारावार


जगमगाते घर

भीतर....बाहर


नहीं मिलेंगे

रिश्तों के दमकते कलेवर
प्यार का इज़हार


आत्मीयता के बंधनवार



बस सारा खेल होगा कमाई का

बड़ा दिख जाने में भलाई का

नदारद होंगे आदर के भाव

माँ-बाप अकेले होंगे गाँव



मनाएंगे रईस बेटे

दीवाली मिलन सामारोह
दिखाई देंगे होड़ के अवरोह


खु़लूस और गर्मजोशी होगी ख़ारिज



सोचिये ...

कहाँ जा रहे हैं हम
दीवाली की बनावटी उजास


में कहाँ गुम हो गई

प्रेम की सुवास



सब हो चला है औपचारिक

दिखावे का ताना बाना

सौहार्द हो गया बेगाना



किससे क्या कहें...बेहतर ही चुप ही रहें

क्या इसी को कहते हैं ज़माने का बदल जाना

रहने दीजिये हुज़ूर....बोलकर

अपनी ही औक़ात को उघाड़ कर दिखाना.