दोस्त ऐसा
जिसे कहो कुछ नहीं
समझ जाए
लिखो कुछ नहीं
पढ़ ले
आवाज़ दो
उसके पहले सुन ले
मुझे गुण-दोष सहित
स्वीकार करे
ग़र चोट लगे उसे
दर्द हो मुझे
कमाल मैं करूँ
गर्व हो उसे
अवसाद से उबार दे
स्नेह दे , सत्कार दे
आलोचना का अधिकार दे
रिश्तों को विस्तार दे
दु:ख में पीछे खड़ा नज़र आए
सुख का सारथी बन जाए
सिर्फ़ एक दिन फ़्रेंड न रहे
दिन-रात प्रति पल
धड़कता रहे सीने में
हैसियत और प्रतिष्ठा से सोचे हटकर
वही मित्र मुझे लगे प्रियकर.