
सेना का एक ज़ाँबाज़ महानायक था वह.उसके परिदृष्य पर आने के बाद
भारतीय सेना की प्रतिष्ठा पूरे विश्व में फ़ैली. जनरल मानेकशा ने सन 1971
के युध्द में देशवासियों के आत्मविश्वास और स्वाभिमान में अविश्वसनीय
इज़ाफ़ा किया. एक प्रश्न छोड़ रहा हूँ आप तक.ज़रा अपने दिल से पूछियेगा.
छोटा मोटा राजनेता गुज़र जाता है ; प्रदेश सरकार राजकीय शोक की घोषणा
कर देती है.राजनीतिक पार्टी के प्रमुख का निधन हो जाए राष्ट्रीय शोक हो जाता
है.
फ़ील्ड मार्शल मानेकशा के निधन पर उनके
सम्मान में राष्ट्रीय शोक क्यों नहीं घोषित किया गया ?
कोई राष्ट्रीय स्तर का नेता उनकी अंत्येष्टी में नहीं पहुँचा.
समाचार पत्रों में ख़बरें छपीं,चैनल्स पर पुरानी फ़िल्मों की रील चली...
चलो हो गई इतिश्री.
दु:ख होता है सोचकर..मेरे शहर में एक फ़िल्म को प्रोमो के लिये
बिग-बी कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन नहीं पहुँच पाते तो युवक/युवतियाँ
रोने लगतीं हैं....अख़बार रोते हुए बिग-बी प्रेमियों की तस्वीरें छापते हैं.
जनरल मानेकशा ने इस देश की सरहद को सुरक्षित रखने के लिये
जो किया ; क्या किसी को बताने की ज़रूरत है ?
हद है एक सच्चे
महानायक के लिये हमारी आँखों की कोर नहीं भीगती.क्या हम एक
ढोंगी और दोगले समय में नहीं जी रहे ?