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Saturday, July 14, 2007

टू मिनिट रिपोर्टिंग के चोचले

कभी बतौर एंकर या आयोजक कई आयोजनों से जुड़्ने का सुअवसर मिलता रहा है इन बरसों में.पिछ्ले दिनों पत्रकार मित्र दीपक असीम ने आजकल अख़बारों में उभर कर आई प्रतिस्पर्धा के चलते रिपोर्टरों के कामकाज और व्यवहार में आई एक विचित्र क़िस्म की हड़बड़ी को खा़सी मज़म्मत की थी.दीपकजी ने मुख़्तसर में अपनी बात कह दी लेकिन उसे पढ़ने के बाद मैने उन कार्यक्रमों को अपने मानस में उभारा तो उनकी बात में दम नज़र ही नहीं आया बल्कि मुझे लगा कि इन बरसों में जब तकनीक बढ़ चली है तब तो मनुष्य के जीवन में ठहराव आना चाहिये लेकिन हो उल्टा रहा है.आज अख़बारों ने शहरी गतिविधियों के बढ़ते एक ऐसी फ़ौज को दफ़्तर में नियुक्त कर लिया है जो या तो पार्ट-टाइमर या बत्तौर ट्रेनी काम कर रहे हैं.ये शुभारंभ या संगीत के जल्सों या फ़ैशन शोज़ में नामज़द किये जाते हैं .आप इनका पहनावा देखिये लगता नहीं कि आप किसी युवा रिपोर्टर से रूबरू हैं...बिखरे बिखरे बाल...लड़कियों को देखिये तो नाभि के ऊपर पहना हुआ टाँप..लड़के जीन्स पहने..शर्ट आधा बाहर आधा भीतर...हाथ में एक राइटिंग पैड है , गले में मोबाइल के हेड्फ़ोन के तार लटके हुए.कैमरा भी इन्ही ने लाद लिया है कंधे पर.

आयोजक के पास आन पहुँचे हैं.वो बेचारा कलाकार और श्रोता-दर्शक के वक़्त पर सभागार में नहीं पहुँचने के कारण पहले ही विचलित है.आप (रिपोर्टर महोदय/महोदया) ने उसे घेर लिया है.सर ! कब शुरू करेंगे क्रियाकर्म (कार्यक्रम)? अब आप इनकी बातचीत पर भी ग़ौर करियेगा..सोचियेगा क्या ये हिन्दी अख़बार के नुमाइन्द हैं ? सर एक्च्युली मुझे प्रेस जल्दी पहुँचना है .हमारे यहाँ डेड-लाइन ही सिक्स थर्टी की है.कब शुरू हो जाएगा आज का कंसर्ट ? आयोजक : पौने छह तक कोशिश करते हैं.कार्यक्रम निर्धारित समय से पौन घंटा पीछे चल रहा हैं. सर पौने छह यानी सेवेन फ़ोर्टी फ़ाइव ? नहीं मैडम फ़ाइव फ़ोर्टी फ़ाइव. ओह ! साँरी ...सर ये मदनमोहनजी कब तक आ जाएंगे..आयोजक माथा फ़ोड लेता है..कार्यक्रम संगीतकार स्वर्गीय मदनमोहन की बरसी पर आयोजित है और उन्हे याद करते हुए शीर्षक दिया गया है”फ़िर वही शाम’ आयोजक सोच रहा है कि कैसे इस बालिका को समझाए कि मदनमोहन को गुज़रे दो दशक से ज़्यादा हो चुके हैं.मदनजी स्वर्ग से तो लौटने से रहे.आयोजक ने जब समझा दिया है तो वह कह रही है अच्छा तो सर ये जो कलाकार हैं ये मदनमोहनजी की रचनाए गाएंगे ? आयोजक: जी.तो सर टाइम पर तो प्रोग्राम स्टार्ट नहीं हो रहा है तो आप मुझे बता दीजिये न कि आज के कलाकार क्या क्या गाने वाले हैं..अरे मैडम वे आ तो जाएं..फ़िर आप ही पूछ लीजियेगा उनसे.

बात चल ही रही है कि कलाकार आ गए..रिपोर्टर का चेहरा खिल उठा है..वो बेचारा रास्ते में ट्राफ़िक जाम से निकलकर आया है और चाहता है कि साउंड सिस्ट्म की पड़ताल कर ले.. अपने प्रतीक्षारत साज़िंदों से चर्चा कर ले..इतने में रिपोर्टर वीर बालिका प्रकट हो गई है...

सर एक्स्क्यूज़ मी प्लीज़... आज आप क्या क्या सुनाने वाले हैं ?

कलाकार : मैडम प्लीज़ आप कंसर्ट में बैठिये न. आपको मज़ा आएगा..सुनिये तो सही हमारी पेशकश

रिपोर्टर : सर क्या बताऊं हमारे सर (उनके सीनियर)हैं न उनके दो बार फ़ोन आ चुके हैं और अगले पंद्रह मिनट में मुझे यहाँ से निकलकर प्रेस पहुँचना है और ये रिपोर्ट फ़ाइल करना है. सर आप तो मुझे गानों की सूची दे दीजिये..संगतकार कलाकार के नाम नोट करवा दीजिये..मेरा काम हो जाएगा.

कलाकार : पर मैडम मैंने कैसा गाया है वह आप कैसे जानेंगीं..

रिपोर्टर :यहाँ मेरे एक मित्र बैठे हैं वे मुझे प्रेस मे मुझे मोबाइल पर नोट करवा देंगे. एक बात और ज़रा मंच पर बैठ कर एक एक्शन दे दीजिये न ..हमारा फ़ोटोग्राफ़र भी निकलना चाहता है आपकी एक तस्वीर ले कर ...वह भी फ़्री सर !

कलाकार बैठ गया है मंच पर...एक्शन चल रहा ..बनावटी सा. बालिका प्रसन्न है ..वह आज टाइम पर रिपोर्ट फ़ाइल कर देगी.जल्दी से जल्दी की ये जो स्थितियाँ हैं; ये क्या संदेश दे रहीं है...रपटकार ने कार्यक्रम सुना नहीं है..जाना नहीं है कि क्या कुछ घटेगा ..लाइव कंसर्ट के फ़ील से बाबस्ता नहीं होना चाहता आज का युवा अख़बारनवीस.ये कैसी प्रतिस्पर्धा...इसे मजबूरी कहना बेहतर होगा.अख़बार का प्रतिनिधि याचक की मुद्रा में नज़र आए ; अच्छा नहीं लगता.अव्वल तो उसे मालूम ही नहीं पड़ने देना चाहिये कि वह मौजूद है..वरना वह कैसे किसी इवेंट का अंडर-करंट ले पाएगा....लेकिन ये सब चल रहा है..शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम में तो हालत और भी ज़्यादा ख़राब है ..एक कलाकार बजा रहा है ...दूसरा रात को ग्यारह बजे बैठेगा ..गाने ..तब तक कैसे रूका जाए...राग का नाम पूछ लिया आर्टिस्ट से..और कहा है सर ज़रा तानपूरा लेकर ग्रीनरूम में ही एक पोज़ दे दीजिये..हम निकल लेते है..घोर हड़बडी़ मची है..राग मारवा गाया गया था..छपा है मालकौंस..तबला बजा था...ढोलक छप रहा है...तानपूरे पर संगत दी फ़लाँ साहब ने तो लिखा जा रहा है सितार पर थे..श्री... अब मज़ा ये है कि तानपूरा संगति देने का वाद्य है जबकि सितार एकल वादन का एक स्वतंत्र वाद्य..शास्त्रीय गायन के साथ तानपूरा बजता है इन्होने छाप मारा है सितार.मजमे को पूरा ही तान दिया है.मेंडोलियन को गिटार और की बोर्ड को केसियो लिख मारेंगे..जबकि केसियो एक ब्रांडनेम भर है...

तो हुज़ूर सब चल रहा है क्योंकि वक़्त बहुत तेज़ चल रहा है...लेकिन बात ग़लत है..वक़्त नहीं मनुष्य बहुत तेज़ चल रहा है...तकनीक बहुत तेज़ चल रही है. या अल्लाह ! ये सारा तामझाम न जाने हमें कहाँ ले जाकर कर छोडे़गा ?
या यूं भी कह सकते हैं..कहीं का भी नहीं छोडे़गा.मिनिट्स में अपने काम को निपटा लेने के ये क़ायदे हैं या चोचले ? आप ही तय करिये.

Thursday, June 14, 2007

सावन आ रहा है...क्या आप स्वागत के लिये तैयार हैं ?

समझ लीजिये कि अब बरस ही गये हैं बादल।मेरे वतन मालवा में मेघ बरसते देखने का अलग ही सुख है।बस फ़र्क़ इतना भर है कि बरसती बारिश में सड़क पर निकलने वाले नज़र नहीं आते अब.एक तो कार वाले बहुत हो गये हैं.मेरे छोटे से शहर (मुंबई-दिल्ली-चैन्ने की तुलना में)इन्दौर में भी सुना है छोटी-बडी़ सात लाख कारें हो गयी हैं.अभी जब ये ब्लाग लिख रहा हूं तो मेरे कमरे की खिड़की के सायबान पर बारिश की बूंदो की टप-टप शुरू हो गई है.

ये आवाज़ें कान में आते ही मुझे अपने दादाजी की याद याद आने लगी है जो अब इस दुनिया में नहीं हैं . वे रह्ते तो थे सैलाना में जो रतलाम जंक्शन से बीस कि.मी.दूर बसी एक प्यारी सी रियासत थी.वे संगीत और खा़सकर क्लासिकल मौसीकी़ में बहुत निष्णांत थे.आसमान में बादलों की घिरावट शुरू होते ही उनका गुनगुनाना शुरू हो जाता आए री बदरा..मोतियन लारा(साथ) लाए...गाओ री मंगल आए री बदरा.इसी आलम में वे मेरी दादी के ज़रिये मेरी मां से भजियों की फ़रमाइश भी कर डालते और इस बहाने हम बच्चों को भी मौसमी व्यंजन का आनन्द मिल जाता.इस मामले आप मुझसे सहमत होंगे कि जो मज़े आपने - मैने अपने बचपन में लिये खानेपीने के वे आजकल के रेडीमेड कल्चर में कहां ? कुरकुरे और अंकल चिप्स खाने वाली पीढी़ उस मज़े से निश्चित ही मरहूम है मो गुज़रे दौर के शान हुआ करते थी.

हां तो मै दादाजी के गायन की बात कर रहा था....उनकी गाई एक और बंदिश याद आ गई....नन्ही नन्ही बूंदन मेहा बरसे...मल्हार के रागों में बंधी ये बंदिशें मन को झकझोर देतीं थी.हां रफ़ी साहब और आशाजी का गाया वह गीत भी तो याद आ गया सावन आए या न आए ..जिया जब झूमें
सावन है...
और हां लताजी और रफ़ी साहब की वो जुगलबंदी....झूले में पवन के आई बहार..(बैजूबावरा) भी याद आ गई.और याद आ गए किशोर भारत भूषण और कमसिन मीनाकुमारी..नौशाद साहब का जादू जगाता संगीत और शकील बदायूंनी के मासूम शब्द.

कु़दरत और संगीत का साथ भी कितना विचित्र है न कि बिना किसी काग़ज़ का सहारा लेकर लिखा जा रहा ये ब्लाग मानो मेरे ज़हन में यादों के हर-सिंगार बन कर झर रहा है.इन्दौर और बैजूबावरा की बात चली है तो देखिये तान - सम्राट उस्ताद अमीर ख़ां साहब भी तो याद आ गए है या यह भी कह सकता हूं कि वो हमारी यादों की महफ़िल में नमूदार हो गए हैं ..उस्ताद का गाया मेघ तो क्लासिकल मौसीकी़ की एक अनमोल धरोहर है.घनन घनन घन बरसो रे..(२) विविध भारती के सुबह साढे़ सात बजे बजने वाले लोकप्रिय कार्यक्रम संगीत सरिता की ह्स्ताक्षर धुन भी मल्हार रंग में ही डूबी हुई है.वह धुन दर-असल बहुत ही लोकप्रिय गीत गरजत बरसत सावन आयो रे..लायो न संग में हमरे बिछरे बलमवा..सखी का करूं हाय..का प्रील्यूड (गीत शुरू होने के पहले बजने वाला संगीत; जो बीच में बजे सो इंटरल्यूड) गायक स्वर हैं..सुधा मल्होत्रा और कमल बारोट के.हाय! क्या मीठी आवाज़ें हैं दोनो की ...मानो एक गुड़ तो दूसरी मिश्री.

तो मै शुरू हुआ था इस बात से कि हुज़ूर मेघराज आ रहे हैं हम सब के द्वारे तो उनका स्वागत कीजिये...भजिये बनाईये ..खाइये..घर में झूला हो तो क्या बात है...अच्छा संगीत सुन सकते हों तो ज़रूर सुनिये ..हां आपके पास पं.भीमसेन जोशी के पहाडी़ स्वर मे निबद्ध मियां की मल्हार की वो चर्चित बंदिश हो तो बरसते पानी में ज़रूर सुनिये..घूम ..अति घूम आई बदरिया..या बादरवा बरसन लागी...

सच मानिये आप पानी में बाहर आकर भिगना नहीं चाहते तो ये बंदिशें आपके मन को ज़रूर भिगो देने की ताक़त रखतीं हैं.तो मेरी बात पर इस बार ग़ौर करियेगा ..बच्चों या मित्र को लेकर बाहर निकलिये तो ..ये सावन बड़ा नखराला है ..यूं ही सबको थोड़े ही भिगोता है...मोटर-बाइक (हैल्मेट अवश्य साथ लीजियेगा) हो तो वह उठा लीजिये और कार हो तो उसे लेकर निकल लीजिये...देखिये तो सही क़ुदरत किस तरह मालामाल है और आपको भी तो करना चाहती है..होली पर गाते हैं न ..फ़ागुन के दिन चार रे ..होली खेल मना रे..अब इसे यूं भी गाया जा सकता है..सावन के दिन चार रे ..सावन खेल मना रे...भीगते हुए कैसा लगा मुझे ज़रूर बताइयेगा...मै तो चला भई ..मेरे हिस्से के भजिये कहीं ख़त्म न हो जाएं.

आप जावेद अख़्तर साहब और ए.आर.रहमान की संगीतमय कारीगरी और आमिर खा़न की खूबसूरत तस्वीर के बरसात में नहाये गीत...घनन घनन घिर आए बदरा का आनंद लीजिये.





Thursday, June 7, 2007

इंसान से बडा़ नज़र आता है हमारा श्वान

मेरे बच्चे बहुत दिनों से ज़िद कर रहे थे डैडी घर में एक कुत्ता पाल लेते हैं।मैने अपने पिताजी से बात की तो वे राज़ी नहीं हुए।कुछ ऐसा हुआ इसके बाद कि मै संयुक्त परिवार से अलग बसेरे में आ गया जो मेरे कार्य-स्थल के ठीक ऊपर है। यानी पहली मंज़िल पर।यहां आते ही बेटी और ख़ासकर बेटे ने घर में श्वान लाने की ज़िद को आंदोलन का रूप दे दिया।संयोग कहूं या मेरी औलादों की क़िस्मत बहुत जल्द ही घर में श्वान आ गया।काला,बड़ा प्यारा सा,दस दिन का था जब हमारे परिवार में शरीक हुआ वो।बेटी का नाम दिशा है और बेटे छोटू कहते हैं॥ यानी दो शब्द मिल गये हमें .सी छोटू के लिये और डी दिशा के लिये॥श्वान को नाम मिल गया सीडी । उसके पंजों पर सुनहरी रंग के निशान है आंखों पर भी और छाती पर भी।पिछ्ले दिनों उसने हमारी गृहस्थी में आने के तीन साल पूरे कर लिये हैं।वो हमारे बहुत से इशारे और शब्द समझ गया है इन सालों में।उसने घर में अपने निशान बना रखे हैं कि वह कहॉ कहाँ तक और किस किस कमरे में आ - जा सकता है।वह डेशुंड प्रजाति का श्वान है॥अब सच मानिये उसे कुत्ता कहने में संकोच होता है॥वह हम सबका प्यारा सीडी जो ठहरा।वह एक छोटे क़द का श्वान है...बहुत भोला , समझदार और सतर्क। हमारे पडौसी के घर की मुंडेर पर देर रात ख़ामोशी से जा रही बिल्ली भी सीडी की नज़रों से ओझल नहीं हो सकती। सीडी बहुत मिलनसार और दोस्ती निभाने वाला श्वान है।वह एक बार आपसे मिल ले तो आपको भूलता नहीं।दिन भर दुम हिलाना उसका सबसे खा़स शग़ल है।उसे घर की रसोई,मंदिर और शयन-कक्ष में जाने की इजाज़त नहीं है तो वो वहां नहीं जाता।आप ज़िक्र भर कर दें कि सीडी तुम्हारा बेल्ट कहां है॥यकी़न जान लें सीडी बाक़ायदा कहीं से भी अपना बेल्ट ढूंढ ही लाते हैं।सीडी बहुत संवेदनशील भी है...हम जब भी प्रवास पर जाते हैं तो उसे हमारे सामान यानी बैग्स से मालूम पड़ जाता है कि घर के लोग कहीं बाहर जाने वाले हैं। अपनी खु़राक़ के मामले में सीडी बिल्कुल भी चटोरा नहीं है।उसे तो हमारी श्रीमतीजी (जिन्हें मेरे अलावा सीडी भी घर की मालकिन ही मानता है ) डरा-धमकाकर ही भोजन खिला पाती हैं।सीडी से में स्वामी-भक्ति का गुण तो सीखने जैसा है ।उससे सबसे प्यारी और महत्वपूर्ण बात सीखने की है उसका अपने परिवार यानी हम सबके लिये सत्कार भाव।हममें से कोई भी या हम सब बाहर से किसी भी वक़्त घर लौटे सीडी सो रहा हो या अपना भोजन कर रहा हो ॥तुरंत दरवाज़े पर आपके स्वागत के लिये तत्पर मिलेगा और कूद-कूद कर पूंछ ज़ोर ज़ोर से हिलाते हुए जताएगा कि वह आपके घर लौटने से कितना खु़श है।वह सिर्फ़ बोलना नहीं जानता लेकिन अपने आपको व्यक्त तो कर ही देता है।उसका हर वक़्त इस तरह हमारी बाट जोहना संदेश और नसीहत देता है कि मेहमाननवाज़ी एक संस्कार है जिसे मनुष्य तक़रीबन भूलता जा रहा है। उसकी अपनी प्राथमिकताएं हैं , बिज़नेस कमिट्मेंट्य हैं,अभिरुचियां हैं और हैं स्वार्थ से जुडे़ कुछ सरोकार जिससे वह तय करता है कि किससे मिलना है...किससे नहीं आपके घर का चौपाया आप पर निर्भर है लेकिन तहज़ीब के नाम पर उसने अपनी प्रतिबध्दताएं नहीं बदलीं हैं।सीडी हमारा श्वान ही सही लेकिन वह कभी कभी एक पाठशाला बन जाता है...इंसान से बडा़ नज़र आता है सीडी.Technorati Profile

Tuesday, May 22, 2007

क्या आपके बच्चे का रिज़ल्ट आने वाला है ?

आज फ़िर मेरी बेटी एक और प्रतियोगी इम्तेहान में फ़ेल हो गयी.जब उसने इंटरनेट पर अपना रिज़ल्ट देखा तो वो निराश हुई. थोड़ी देर बाद वह तो अपने रूटीन में व्यस्त हो गयी लेकिन उसकी मां यानी मेरी श्रीमती कुछ ज़्यादा ही सुस्त नज़र आईं.खाना परोसते वक़्त भी उनका मूड कुछ उखड़ा हुआ ही रहा.मैने कारण पूछा तो कहने लगीं ..बिटिया पास हो जाती तो हम उसके करियर के प्रति आश्वस्त हो जाते . पांच साल में डाक्टर बन जाती.मैने कहा हमने पच्चीस साल पहले जब अपनी ज़िन्दगी का आगा़ज़ किया था तब हमारे माता-पिता तो इतने चिंतित तो नहीं थे कि हम अपनी जीवन नैया को कैसे चलाएंगे तो तुम अपने बच्चों के प्रति इतनी असहज और unsafe क्यों महसूस कर रही हो.वे ज़्यादा कुछ नहीं बोलीं लेकिन मैने उनके हाव-भाव से जान लिया कि वे दु:खी हैं..स्वाभाविक भी है उनका व्यवहार..लेकिन आप सच मानिये मै इस मामले में अपनी पत्नी से असहमत हूं.मेरा मानना है कि अब करियर के इतने ज़्यादा विकल्प मौजूद हैं कि बच्चा एकबार तय कर ले कि उसे किसी नई विधा में जाना है तो राह में किसी प्रकार की कोई रूकावट नहीं है. क्यों ऐसा ज़रूरी है कि हमारे समाज के सारे बच्चे डाक्टर , इंजीनियर , चार्टर्ड अकाउंटेंट ही बनें...कोई चित्रकार,लेखक,संगीतकार क्यों नहीं बनना चाहता. हमें समझना पडे़गा कि हर बच्चे की अपनी एक निजी प्रतिभा होती है...हम ( या बच्चे भी) नाहक ही देखा देखी में चाहते हैं कि हमारा बच्चा भी को बेहतरीन करियर चुन ले.लेकिन ऐसा होत नहीं है...हम तो बच्चे के हितैषी होते ही हैं लेकिन समाज का माहौल भी उसे बहुत विचलित करता है.उसके दोस्त,अख़बारों मे छ्प रहे कोचिंग इन्स्टीटूट्स के रंगीन इश्तेहार उसके मन में एक विचित्र और मनोवैग्यानिक विचलन पैदा करते हैं ..उसका मासूम मन द्वंद की मनोस्थिति में आ जाता है..वह अपने आपको उसके सह-पाठियों से तौलने लगता है.इस स्थिति में उसे एक हमदर्द की सख्त़ ज़रूरत है.उसके मित्र बन जाईये...श्रीमतीजी जब सो गयी तो मैने बहुत प्यार से बिटिया से बात की और कहा कि एक इम्तेहान तुम्हारी ज़िन्दगी का पूरा फ़ैसला नहीं कर देगा. हालातों से हारोगी तो चलेगा ...लेकिन अपने आपसे मत हारना. मेडीकल में सफ़ल नहीं हो पाईं तो क्या हुआ कुछ और try करो.तुम्हारे सामने पूरा आसमान खुला है. आज से ही किसी नये विचार को मन मे पल्लवित होने दो...चाहोगी तो ज़रूर कुछ कर गुज़रोगी.अपने हौसले को ठंडा मत पड़्ने दो . चाह रही तो ...राह भी मिल जाएगी.
मैं इस चिट्ठे के ज़रिय आपसे भी यही प्रार्थना करना चाह रहा हूं...यदि आपके बच्चों ने दसवीं या बारहवीं का बोर्ड एक्ज़ाम दी है तो जल्द ही उसका रिज़ल्ट आने वाला है...भगवान से प्रार्थना करता हूं कि वो अच्छे नम्बरों से पास हो...अन्य competitive exams में भी क़ामयाब रहे..लेकिन खु़दा न खा़स्ता वह अच्छा नहीं कर पाता है निराश होने की आवश्यकता नहीं...धीरज रखिये...उसे हिम्मत दीजिये..नये विकल्पों पर नज़र रखिये...बच्चों को हमारे संग-साथ की बहुत दरकार होगी इस समय.please be very caring with them. उन्हे अवसाद से बचाना है हमें..वे आज हौसला रख लेंगे तो सुख का सुरज ज़रूर ऊगेगा.वो सुबहा ज़रूर आएगी.आमीन.

Tuesday, April 17, 2007

मीडिया ट्रायल ....समय से पहले निर्णय

टीवी चैनल्स पर आप इन दिनों आप देख रहे हैं कि कुछ important issuses पर न्यायाधीश की भूमिका निभाई जा रही है...ऐसा समाज का एक वर्ग मानता है। अभी पिछले दिनों IBN 7 के आनंद पाण्डेय , आजतक की रितुल जोशी और ndtv के अभिसार के साथ एक लाइव टॉक शो एंकर करने का मौका मिला . इन्दौर शहर के मध्य में प्रेस क्लब द्वारा आयोजित यह टॉक शो बहुत जीवंत था। इसमें भाग लेने वाले लोगों मे आम आदमी था, प्रेस के लोग थे वकील थे और थे पत्रकारिता के बहुत से युवा विद्यार्थी ...सभी ने ये माना कि कभी कभी टीवी चैनेल्स अपनी trp के चक्कर में खुद अपनी ओर से कुछ मुद्दों दो थोपने की कोशिश करती है..जैसे कि अभिषेक और एश्वर्या की शादी ..क्यों electronic channels चाहती हैं कि हम ये देखें कि एश्वर्या और जया बच्चन बाज़ार में कौन सी साडी खरीद रहीं हैं ...प्रतिभागियों का ये भी मानना था चैनेल्स वही दिखा रहे हैं जो दर्शक चाह रहा है। युवा पत्रकारों का अभिमत था कि निश्चित रुप से अब ये ना मना जाये कि टीवी चैनेल्स सिर्फ किसी मिशन भाव या समाज सेवा के लिए परिदृश्य पर हैं। सबको अपने अस्तित्व की लडाई लड़ना है trp हर लम्हा एक शैतान की तरह आप के सर पर सवार है और telecasters / journalists की एक अहम जिम्मेदारी है कि वे दर्शक संख्या के लिए बाख़बर ही नहीं ..सचेत भी रहें.कई लोगों ने इस बात पर भी सहमति जताई कि टीवी चैनेल्स ने कई बार एक हमदर्द की भूमिका भी निभाई है...कई लोगों ने माना कि अपराध के उन्मूलन मे टीवी चैनेल्स का एक जागरूक रोल रहा है थाने में जाने से पहले पीड़ित चैनेल में जाकर अपना दर्द बताने के लिए ज़्यादा बेसब्र है.उसे उम्मीद रहती है कि उसे न्याय मिलेगा या न्याय मे तेज़ी आएगी .एक अन्य मंच से यह बात भी सुनाई दीं कि यदि आपातकाल के ज़माने में टीवी चैनेल्स होते तो शायद emergency लगती ही नहीं। इस शो को आयोजित कराने में इन्दौर प्रेस क्लब के जुझारू साथी श्री प्रवीण खारीवाल की सक्रिय भुमिका रही .सवाल वाकई ज्वलंत है और आप दोस्तों की राय की दरकार करता है.अपनी ओर से ये ज़रूर कहना चाहूँगा कि टीवी चैनल्स (खासकर न्यूज़ चैनेल्स ) आने के बाद आम आदमी कि हिम्मत बढ़ी है और उसे लगता है कि न्यायपालिका के अलावा एक और संगठन है जो उसके दर्द से सरोकार रखता है ; या उसकी परेशानी में पीछे खड़ा है या उसकी जिल्लत की घड़ी मे उसके साथ आवाज़ मिला रहा है.

Sunday, April 15, 2007

गुम होते जा रही रिश्तों की खुशबू


गुम होती जा रही ब्याह शादियों की आत्मीय महक
शादी ब्याह का सीजन बहार पर है...क्या रौनक है भाई.डेकोरेशन देखिए,फैशन देखिए,लटके- झटके दिखिये,वैभव और दिखावे की धूम है इन दिनों .सारा काम टर्न की बेसिस वाला हो गया है आजकल .फ़ोन घुमाईये सारा इंतजाम हो जाएगा.आप तो बस चैक बुक साथ रखिये अपने पास.जज्बा होना चाहिए खर्च करने का.बस दूल्हा - दुल्हन ही बाज़ार मे नहीं मिल पा रहे हैं....बाकी तो सब तैयार है हुज़ूर। बोलो जी तुम क्या क्या खरीदोगे ?गुम है तो बस भावनाएं ..आत्मीयता ...सब कुछ रस्मी हो चला है...और तो और...घर में गाये -बजाने वाले गीते भी अब इवेंट मैनेजर को सौंपे जा रहे हैं.बड़ी धूम मची है संगीत आयोजनों की...नाचे जा रहे हैं क़मर हिला हिला के...एक उन्माद है ...होड़ है ...हमारा जलसा सबसे महंगा...सबसे चमकीला ...सबसे चर्चित और सबसे ज़्यादा रौनक वाला हो...पर भाई एक बात पूछना चाहता हूँ आपसे ये सारा दिखावा कर के आप अपने से छोटी हैसियत वालों को क्या संदेश दे रहें हैं .सचाई ये है कि competition के इस दौर में हम बताना चाहते हैं कि हम दूसरों से कितने आगे हैं.दिल कि रिश्तों से हमे क्या लेना-देना .हमारी झांकी हो जाये बस ...जो नहीं कर पाते वो जलते हैं ...आप सहमत होंगे कि इन महंगी रस्मों में से वो खुशबू गुम है जिनसे झलकता तो असीम स्नेह ..प्यार और ख़ुलूस .हम क्या थे ...क्या हो गए ...क्या होंगे....हां याद आई एक बात...पिछले दिनों एक मराठी लेख मे पढा कि इन्सान कि फितरत क्यों बदलती जा रही है....लिखनेवाले बड़ी पते की बात कही....हम भोजन करने का अच्छा काम घर में करते थे...अब इस काम के लिए होटल जाने लगे ....शौच जैसा कार्य बाहर करते थे .....वो अब सिरहाने लगे attached bathroom में करने लगे......ज़माना आगे जाए किसे बुरा लगता है ...सोच को आगे ले जाने मे कोइ हर्ज़ नहीं लेकिन परम्पराओं से मिली अच्छाईयों को भी मत बिसराइये.नये से नया लीजिये ...पुराने को खारिज मत कीजिये.अच्छे बने रहने में अच्छाई है जैसे दूध में मलाई है.जय हो.