Saturday, July 14, 2007
टू मिनिट रिपोर्टिंग के चोचले
आयोजक के पास आन पहुँचे हैं.वो बेचारा कलाकार और श्रोता-दर्शक के वक़्त पर सभागार में नहीं पहुँचने के कारण पहले ही विचलित है.आप (रिपोर्टर महोदय/महोदया) ने उसे घेर लिया है.सर ! कब शुरू करेंगे क्रियाकर्म (कार्यक्रम)? अब आप इनकी बातचीत पर भी ग़ौर करियेगा..सोचियेगा क्या ये हिन्दी अख़बार के नुमाइन्द हैं ? सर एक्च्युली मुझे प्रेस जल्दी पहुँचना है .हमारे यहाँ डेड-लाइन ही सिक्स थर्टी की है.कब शुरू हो जाएगा आज का कंसर्ट ? आयोजक : पौने छह तक कोशिश करते हैं.कार्यक्रम निर्धारित समय से पौन घंटा पीछे चल रहा हैं. सर पौने छह यानी सेवेन फ़ोर्टी फ़ाइव ? नहीं मैडम फ़ाइव फ़ोर्टी फ़ाइव. ओह ! साँरी ...सर ये मदनमोहनजी कब तक आ जाएंगे..आयोजक माथा फ़ोड लेता है..कार्यक्रम संगीतकार स्वर्गीय मदनमोहन की बरसी पर आयोजित है और उन्हे याद करते हुए शीर्षक दिया गया है”फ़िर वही शाम’ आयोजक सोच रहा है कि कैसे इस बालिका को समझाए कि मदनमोहन को गुज़रे दो दशक से ज़्यादा हो चुके हैं.मदनजी स्वर्ग से तो लौटने से रहे.आयोजक ने जब समझा दिया है तो वह कह रही है अच्छा तो सर ये जो कलाकार हैं ये मदनमोहनजी की रचनाए गाएंगे ? आयोजक: जी.तो सर टाइम पर तो प्रोग्राम स्टार्ट नहीं हो रहा है तो आप मुझे बता दीजिये न कि आज के कलाकार क्या क्या गाने वाले हैं..अरे मैडम वे आ तो जाएं..फ़िर आप ही पूछ लीजियेगा उनसे.
बात चल ही रही है कि कलाकार आ गए..रिपोर्टर का चेहरा खिल उठा है..वो बेचारा रास्ते में ट्राफ़िक जाम से निकलकर आया है और चाहता है कि साउंड सिस्ट्म की पड़ताल कर ले.. अपने प्रतीक्षारत साज़िंदों से चर्चा कर ले..इतने में रिपोर्टर वीर बालिका प्रकट हो गई है...
सर एक्स्क्यूज़ मी प्लीज़... आज आप क्या क्या सुनाने वाले हैं ?
कलाकार : मैडम प्लीज़ आप कंसर्ट में बैठिये न. आपको मज़ा आएगा..सुनिये तो सही हमारी पेशकश
रिपोर्टर : सर क्या बताऊं हमारे सर (उनके सीनियर)हैं न उनके दो बार फ़ोन आ चुके हैं और अगले पंद्रह मिनट में मुझे यहाँ से निकलकर प्रेस पहुँचना है और ये रिपोर्ट फ़ाइल करना है. सर आप तो मुझे गानों की सूची दे दीजिये..संगतकार कलाकार के नाम नोट करवा दीजिये..मेरा काम हो जाएगा.
कलाकार : पर मैडम मैंने कैसा गाया है वह आप कैसे जानेंगीं..
रिपोर्टर :यहाँ मेरे एक मित्र बैठे हैं वे मुझे प्रेस मे मुझे मोबाइल पर नोट करवा देंगे. एक बात और ज़रा मंच पर बैठ कर एक एक्शन दे दीजिये न ..हमारा फ़ोटोग्राफ़र भी निकलना चाहता है आपकी एक तस्वीर ले कर ...वह भी फ़्री सर !
कलाकार बैठ गया है मंच पर...एक्शन चल रहा ..बनावटी सा. बालिका प्रसन्न है ..वह आज टाइम पर रिपोर्ट फ़ाइल कर देगी.जल्दी से जल्दी की ये जो स्थितियाँ हैं; ये क्या संदेश दे रहीं है...रपटकार ने कार्यक्रम सुना नहीं है..जाना नहीं है कि क्या कुछ घटेगा ..लाइव कंसर्ट के फ़ील से बाबस्ता नहीं होना चाहता आज का युवा अख़बारनवीस.ये कैसी प्रतिस्पर्धा...इसे मजबूरी कहना बेहतर होगा.अख़बार का प्रतिनिधि याचक की मुद्रा में नज़र आए ; अच्छा नहीं लगता.अव्वल तो उसे मालूम ही नहीं पड़ने देना चाहिये कि वह मौजूद है..वरना वह कैसे किसी इवेंट का अंडर-करंट ले पाएगा....लेकिन ये सब चल रहा है..शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम में तो हालत और भी ज़्यादा ख़राब है ..एक कलाकार बजा रहा है ...दूसरा रात को ग्यारह बजे बैठेगा ..गाने ..तब तक कैसे रूका जाए...राग का नाम पूछ लिया आर्टिस्ट से..और कहा है सर ज़रा तानपूरा लेकर ग्रीनरूम में ही एक पोज़ दे दीजिये..हम निकल लेते है..घोर हड़बडी़ मची है..राग मारवा गाया गया था..छपा है मालकौंस..तबला बजा था...ढोलक छप रहा है...तानपूरे पर संगत दी फ़लाँ साहब ने तो लिखा जा रहा है सितार पर थे..श्री... अब मज़ा ये है कि तानपूरा संगति देने का वाद्य है जबकि सितार एकल वादन का एक स्वतंत्र वाद्य..शास्त्रीय गायन के साथ तानपूरा बजता है इन्होने छाप मारा है सितार.मजमे को पूरा ही तान दिया है.मेंडोलियन को गिटार और की बोर्ड को केसियो लिख मारेंगे..जबकि केसियो एक ब्रांडनेम भर है...
तो हुज़ूर सब चल रहा है क्योंकि वक़्त बहुत तेज़ चल रहा है...लेकिन बात ग़लत है..वक़्त नहीं मनुष्य बहुत तेज़ चल रहा है...तकनीक बहुत तेज़ चल रही है. या अल्लाह ! ये सारा तामझाम न जाने हमें कहाँ ले जाकर कर छोडे़गा ?
या यूं भी कह सकते हैं..कहीं का भी नहीं छोडे़गा.मिनिट्स में अपने काम को निपटा लेने के ये क़ायदे हैं या चोचले ? आप ही तय करिये.
Thursday, June 14, 2007
सावन आ रहा है...क्या आप स्वागत के लिये तैयार हैं ?
ये आवाज़ें कान में आते ही मुझे अपने दादाजी की याद याद आने लगी है जो अब इस दुनिया में नहीं हैं . वे रह्ते तो थे सैलाना में जो रतलाम जंक्शन से बीस कि.मी.दूर बसी एक प्यारी सी रियासत थी.वे संगीत और खा़सकर क्लासिकल मौसीकी़ में बहुत निष्णांत थे.आसमान में बादलों की घिरावट शुरू होते ही उनका गुनगुनाना शुरू हो जाता आए री बदरा..मोतियन लारा(साथ) लाए...गाओ री मंगल आए री बदरा.इसी आलम में वे मेरी दादी के ज़रिये मेरी मां से भजियों की फ़रमाइश भी कर डालते और इस बहाने हम बच्चों को भी मौसमी व्यंजन का आनन्द मिल जाता.इस मामले आप मुझसे सहमत होंगे कि जो मज़े आपने - मैने अपने बचपन में लिये खानेपीने के वे आजकल के रेडीमेड कल्चर में कहां ? कुरकुरे और अंकल चिप्स खाने वाली पीढी़ उस मज़े से निश्चित ही मरहूम है मो गुज़रे दौर के शान हुआ करते थी.
हां तो मै दादाजी के गायन की बात कर रहा था....उनकी गाई एक और बंदिश याद आ गई....नन्ही नन्ही बूंदन मेहा बरसे...मल्हार के रागों में बंधी ये बंदिशें मन को झकझोर देतीं थी.हां रफ़ी साहब और आशाजी का गाया वह गीत भी तो याद आ गया सावन आए या न आए ..जिया जब झूमें
सावन है...और हां लताजी और रफ़ी साहब की वो जुगलबंदी....झूले में पवन के आई बहार..(बैजूबावरा) भी याद आ गई.और याद आ गए किशोर भारत भूषण और कमसिन मीनाकुमारी..नौशाद साहब का जादू जगाता संगीत और शकील बदायूंनी के मासूम शब्द.
कु़दरत और संगीत का साथ भी कितना विचित्र है न कि बिना किसी काग़ज़ का सहारा लेकर लिखा जा रहा ये ब्लाग मानो मेरे ज़हन में यादों के हर-सिंगार बन कर झर रहा है.इन्दौर और बैजूबावरा की बात चली है तो देखिये तान - सम्राट उस्ताद अमीर ख़ां साहब भी तो याद आ गए है या यह भी कह सकता हूं कि वो हमारी यादों की महफ़िल में नमूदार हो गए हैं ..उस्ताद का गाया मेघ तो क्लासिकल मौसीकी़ की एक अनमोल धरोहर है.घनन घनन घन बरसो रे..(२) विविध भारती के सुबह साढे़ सात बजे बजने वाले लोकप्रिय कार्यक्रम संगीत सरिता की ह्स्ताक्षर धुन भी मल्हार रंग में ही डूबी हुई है.वह धुन दर-असल बहुत ही लोकप्रिय गीत गरजत बरसत सावन आयो रे..लायो न संग में हमरे बिछरे बलमवा..सखी का करूं हाय..का प्रील्यूड (गीत शुरू होने के पहले बजने वाला संगीत; जो बीच में बजे सो इंटरल्यूड) गायक स्वर हैं..सुधा मल्होत्रा और कमल बारोट के.हाय! क्या मीठी आवाज़ें हैं दोनो की ...मानो एक गुड़ तो दूसरी मिश्री.
तो मै शुरू हुआ था इस बात से कि हुज़ूर मेघराज आ रहे हैं हम सब के द्वारे तो उनका स्वागत कीजिये...भजिये बनाईये ..खाइये..घर में झूला हो तो क्या बात है...अच्छा संगीत सुन सकते हों तो ज़रूर सुनिये ..हां आपके पास पं.भीमसेन जोशी के पहाडी़ स्वर मे निबद्ध मियां की मल्हार की वो चर्चित बंदिश हो तो बरसते पानी में ज़रूर सुनिये..घूम ..अति घूम आई बदरिया..या बादरवा बरसन लागी...
सच मानिये आप पानी में बाहर आकर भिगना नहीं चाहते तो ये बंदिशें आपके मन को ज़रूर भिगो देने की ताक़त रखतीं हैं.तो मेरी बात पर इस बार ग़ौर करियेगा ..बच्चों या मित्र को लेकर बाहर निकलिये तो ..ये सावन बड़ा नखराला है ..यूं ही सबको थोड़े ही भिगोता है...मोटर-बाइक (हैल्मेट अवश्य साथ लीजियेगा) हो तो वह उठा लीजिये और कार हो तो उसे लेकर निकल लीजिये...देखिये तो सही क़ुदरत किस तरह मालामाल है और आपको भी तो करना चाहती है..होली पर गाते हैं न ..फ़ागुन के दिन चार रे ..होली खेल मना रे..अब इसे यूं भी गाया जा सकता है..सावन के दिन चार रे ..सावन खेल मना रे...भीगते हुए कैसा लगा मुझे ज़रूर बताइयेगा...मै तो चला भई ..मेरे हिस्से के भजिये कहीं ख़त्म न हो जाएं.
आप जावेद अख़्तर साहब और ए.आर.रहमान की संगीतमय कारीगरी और आमिर खा़न की खूबसूरत तस्वीर के बरसात में नहाये गीत...घनन घनन घिर आए बदरा का आनंद लीजिये.
Thursday, June 7, 2007
इंसान से बडा़ नज़र आता है हमारा श्वान
Tuesday, May 22, 2007
क्या आपके बच्चे का रिज़ल्ट आने वाला है ?
मैं इस चिट्ठे के ज़रिय आपसे भी यही प्रार्थना करना चाह रहा हूं...यदि आपके बच्चों ने दसवीं या बारहवीं का बोर्ड एक्ज़ाम दी है तो जल्द ही उसका रिज़ल्ट आने वाला है...भगवान से प्रार्थना करता हूं कि वो अच्छे नम्बरों से पास हो...अन्य competitive exams में भी क़ामयाब रहे..लेकिन खु़दा न खा़स्ता वह अच्छा नहीं कर पाता है निराश होने की आवश्यकता नहीं...धीरज रखिये...उसे हिम्मत दीजिये..नये विकल्पों पर नज़र रखिये...बच्चों को हमारे संग-साथ की बहुत दरकार होगी इस समय.please be very caring with them. उन्हे अवसाद से बचाना है हमें..वे आज हौसला रख लेंगे तो सुख का सुरज ज़रूर ऊगेगा.वो सुबहा ज़रूर आएगी.आमीन.
Tuesday, April 17, 2007
मीडिया ट्रायल ....समय से पहले निर्णय
Sunday, April 15, 2007
गुम होते जा रही रिश्तों की खुशबू

गुम होती जा रही ब्याह शादियों की आत्मीय महक
शादी ब्याह का सीजन बहार पर है...क्या रौनक है भाई.डेकोरेशन देखिए,फैशन देखिए,लटके- झटके दिखिये,वैभव और दिखावे की धूम है इन दिनों .सारा काम टर्न की बेसिस वाला हो गया है आजकल .फ़ोन घुमाईये सारा इंतजाम हो जाएगा.आप तो बस चैक बुक साथ रखिये अपने पास.जज्बा होना चाहिए खर्च करने का.बस दूल्हा - दुल्हन ही बाज़ार मे नहीं मिल पा रहे हैं....बाकी तो सब तैयार है हुज़ूर। बोलो जी तुम क्या क्या खरीदोगे ?गुम है तो बस भावनाएं ..आत्मीयता ...सब कुछ रस्मी हो चला है...और तो और...घर में गाये -बजाने वाले गीते भी अब इवेंट मैनेजर को सौंपे जा रहे हैं.बड़ी धूम मची है संगीत आयोजनों की...नाचे जा रहे हैं क़मर हिला हिला के...एक उन्माद है ...होड़ है ...हमारा जलसा सबसे महंगा...सबसे चमकीला ...सबसे चर्चित और सबसे ज़्यादा रौनक वाला हो...पर भाई एक बात पूछना चाहता हूँ आपसे ये सारा दिखावा कर के आप अपने से छोटी हैसियत वालों को क्या संदेश दे रहें हैं .सचाई ये है कि competition के इस दौर में हम बताना चाहते हैं कि हम दूसरों से कितने आगे हैं.दिल कि रिश्तों से हमे क्या लेना-देना .हमारी झांकी हो जाये बस ...जो नहीं कर पाते वो जलते हैं ...आप सहमत होंगे कि इन महंगी रस्मों में से वो खुशबू गुम है जिनसे झलकता तो असीम स्नेह ..प्यार और ख़ुलूस .हम क्या थे ...क्या हो गए ...क्या होंगे....हां याद आई एक बात...पिछले दिनों एक मराठी लेख मे पढा कि इन्सान कि फितरत क्यों बदलती जा रही है....लिखनेवाले बड़ी पते की बात कही....हम भोजन करने का अच्छा काम घर में करते थे...अब इस काम के लिए होटल जाने लगे ....शौच जैसा कार्य बाहर करते थे .....वो अब सिरहाने लगे attached bathroom में करने लगे......ज़माना आगे जाए किसे बुरा लगता है ...सोच को आगे ले जाने मे कोइ हर्ज़ नहीं लेकिन परम्पराओं से मिली अच्छाईयों को भी मत बिसराइये.नये से नया लीजिये ...पुराने को खारिज मत कीजिये.अच्छे बने रहने में अच्छाई है जैसे दूध में मलाई है.जय हो.