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Wednesday, June 11, 2008

एक दिनी पर्यावरण दिवस के बाद अनुपम मिश्र की खरी खरी

अनुपम मिश्र का नाम पर्यावरण का पर्याय बन गया है.
प्रचार ,प्रतिष्ठा और सम्मानों से परे अनुपम भाई अपने
काम में ख़ामोशी से लगे रहते हैं.यदि सादा जीवन –उच्च
विचार जैसी कहावत को जीता-जागता देखना है तो अनुपमजी
से मिलिये. उनके दो ग्रंथ (इन्हें किताब पाप लगता है मुझे)
हमारा पर्यावरण और आज भी खरे हैं तालाब पर्यावरण-प्रेमियों,
शोधार्थियों और स्वयंसेवी संगठनों के गीता,क़ुरान और बाईबल
हैं.बहुत पहले से अनुपम भाई का ये लेख मेरे पास सहेजा हुआ
था. रस्मी पर्यावरण दिवस के चले जाने के बाद इसे अवश्य
पढ़ना चाहिये...और हाँ घर के बुज़ुर्गों की सीख तरह अनुपम मिश्र
इन बातों को गंभीरता से लेना चाहिये.

पर्यावरण दिवस चला गया है। एक दिन पर्यावरण का दिवस मनाना बाकी दिन शायद पर्यावरण की रात मनाना! इसमें कोई देखता नहीं कि देश के पर्यावरण का क्या होता है ? पहले दिवस भी नहीं मनता था। सन् १९७२ के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ के झंडे के नीचे पर्यावरण नाम से कुछ काम शुरु हुआ तो हमारे जैसे देशों ने भी धीरे-धीरे गिरते-पड़ते इस शब्द को, इस विषय को सरकारी भाषा, नीति और अमल में अपना लिया। आज बहुत कम लोगों को अंदाज़ होगा कि तीस साल पहले ऐसा कोई मंत्रालय नहीं होता था। बीच में कुछ दिन मंत्रालय की थोड़ी-बहुत उपस्थिति अख़बारों में ज़रूर दिखी होगी। लेकिन आज पर्यावरण मंत्रालय फिर से ग़ायब हो गया है। दिवस के कारण इस विषय की ओर मंत्रालय की कुछ याद जाए तो अलग बात है। नहीं तो साल भर यह सब कहीं दिखता नहीं। आज जब सारे मंत्रालय उद्योग और संस्थाएँ बाज़ारीकरण के दौर में अपना सौदा बेचने की लाइन में लगे हों तो पर्यावरण से बड़ा और कौन-सा सौदा होगा। इस सौदे में पूरे देश की ज़मीन है, ज़मीन के ऊपर का जंगल है, ज़मीन के नीचे का खनिज भंडार है। सारी नदियॉं हैं, ऊपर और नीचे का पानी है। बोली लगाइए हम इस सबको बेचने के लिए तैयार खड़े हैं। हम तो ख़ुद अपने को बेचने के लिए तैयार हैं। इस हाट में खड़े होकर हम यह भी भूल चुके हैं कि इस ज़मीन पर हमारे समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपना जीवन-यापन साथ-साथ करता रहा है। आज उसे हमने उसके आँगन में ही विस्थापित बना दिया है। इस विस्थापन की चीख-पुकार, रोना-धोना कुछ सुनाई नहीं देता है। समाज का यह बड़ा हिस्सा हतप्रभ है कि उसके अपने ही लोग उसे विस्थापित करके आगे बढ़ जाएँगे। ऐसी विचित्र हालत में पर्यावरण का विनाश भी लोगों को विस्थापित करता है और ज़्यादातर मामलों में पर्यावरण के संरक्षण की योजना भी उन्हें खदेड़ने का काम करती है। शेरों को बचाने के लिए लोगों को खदेड़ा गया और अब ऊपर से लेकर नीचे तक सरकार के ही लोग यह घोषणा कर रहे हैं कि जंगल में शेर नहीं बचा। इस घोषणा का श्रेय भी उन्हीं को जा रहा है।

ऐसे में पर्यावरण की रखवाली की ज़िम्मेदारी किन पर होगी। दस-पॉंच संस्थाओं पर, दस-पॉंच जनांदोलनों पर, दस-पॉंच अख़बारों और पत्रिकाओं पर। छोटी होती जा रही इस सूची में एकाध छोटा-सा टीवी चैनल भी कभी जुड़ेगा-कभी हटेगा। मेनका आएँगी, मेनका जाएँगी। इसमें भी हमें विदेशी चैनल का सहारा लेना पड़ेगा। पर क्या ये चैनल हमारे देश के पर्यावरण को बचा पाएँगे।

"तुम्हीं ने दर्द दिया, तुम्हीं दवा देना' की तर्ज़ पर पर्यावरण के संरक्षण के लिए पिछले दौर में ढेर से क़ानून बनाए गए लेकिन उनका पालन हो रहा है या नहीं, इसकी ज़िम्मेदारी उठाने वाले विभाग के दॉंत-नाखून कभी बढ़ने नहीं दिए गए और वह किसी पर्यावरण अपराधी को दबोच नहीं सका। इसमें भी नाम कमाया अदालतों ने। इसलिए शेर बचाने का ढॉंचा बना, लेकिन शेर नहीं बचे, ढॉंचा बच गया है। नदियों को बचाने के क़ानून बने लेकिन नदियॉं नाले बन गईं। उद्योगों से, शहरों से प्रदूषित होने वाले जल-स्रोतों की रखवाली के लिए ये क़ानून सामने नहीं आ पाए।

लोग और आंदोलन सामने आए, उन पर लाठियॉं चलीं और गोलियॉं भी। जिस राज ने अपने कंधों पर पर्यावरण की रक्षा का सारा भार उठाया था, आज उसी के हाथों इसे नष्ट किया जा रहा है। उसी के पैरों से इसे रौंदा जा रहा है। यह सब विकास के नाम पर होता है, इसलिए हमें पर्यावरण को समझने से पहले विकास को भी समझना चाहिए। ऐसा न हो कि ऐसे कुछ शब्द किसी कोड (गुप्त) भाषा के अंग बन जाएँ और हम इनको रटते-रटते अपना गॉंव-शहर और अपनी प्राकृतिक संपदा नए सौदागरों के हाथ में बेच दें। कोड नहीं समझेंगे तो कभी कोई सरकार नदियों को जोड़ेगी तो कभी कोई सरकार नदियों को तोड़ेगी और दोनों मौक़ों पर हमारे समाज का वाचाल वर्ग तालियॉं बजाएगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अभी कुछ ही दिन पहले देश भर की नदियों को जोड़ने की एक भयानक योजना सामने आई थी। उसमें वैज्ञानिक माने गए देश के सर्वोच्च नेता, हृदय माने गए प्रधानमंत्री, लौह पुरुष नेता और उस समय की विपक्ष की त्यागमूर्ति नेता भी शामिल थीं। ऐसी सर्वसम्मति देश के लिए बहुत ख़तरनाक है। असहमति का एक छोटा-सा स्वर भी पर्यावरण की कितनी सेवा कर सकता है-यह उस समय किसी के ध्यान में नहीं आया।

पर्यावरण की चिंता रखकर किए जाने वाले अच्छे काम भी हैं, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है। आज के दिन उन्हें गिनने के बदले दूसरे कामों को ही याद करना चाहिए ताकि आने वाले तीन सौ चौसठ दिनों में हम उस बड़ी संहारक सूची में से कुछ को छॉंट कर उन्हें रोकने का अपना कर्तव्य समझें।