
एक बरस पहले ब्लॉग बिरादरी में शामिल हुआ था.
इस दौरान ये महसूस हुआ कि चिट्ठाकारी ने
ज़िन्दगी को एक सकारात्मक विस्तार और
लिखने-पढ़ने को एक नेक-नशा दे दिया.
आभार; पूरी ब्लॉग-बिरादरी का;आप सब जुड़कर
एक बड़े क़ुनबे जैसा प्यार भरा राब्ता बना.
बहरहाल ; सौ पोस्ट जारी कर देना कोई कारनामा नहीं है;
लेकिन सौं वीं पोस्ट के रूप में जो रचना जारी करना चाहूँगा
वह पिता श्री नरहरि पटेल की है जिनसे बोलने,लिखने और पढ़ने
का शऊर मिला. मैंने उन्हें ही अपना आदर्श माना क्योंकि ज़िन्दगी
की दीगर तरबियतें और सलाहियते उनसे ही मिलीं .
ये मेरा उनके प्रति एक आदर भरा शुक्राना भी है , उस सब के लिये
जो उनसे मिला संस्कारों,नसीहतों और मशवरों के रूप में.
बरसों पहले लिखी गई पिताश्री की यह कविता मन को बहुत छूती है और
हमेशा कुछ करने का जज़्बा देती है.मुलाहिज़ा फ़रमाएँ.......
जी चाहता है !
जी चाहता है
कि जीवन हर क्षण जी लूँ
वह भी ऐसा जीऊँ
कि जीवन का हर क्षण
सार्थक हो जाए
मुझसे किसी को
कोई शिकायत न रह जाए
जी चाहता है
जी चाहता है
कि जीवन का हर घूँट पी लूँ
कड़वा,मीठा,खारा,
और वह भी ऐसा पीऊँ
कि जीवन का हर घूँट
तृप्त हो जाए
बस ! तिश्नगी मिट जाए
जी चाहता है
जी चाहता है
कि जीवन की फटी चादर सी लूँ
और वह भी ऐसी सिऊँ
के उसके तार तार चमके
उसकी हर किनार दमके
उसके बूँटों में ख़ुशबू भर जाए
पता नहीं ये चादर
किसी के काम आ जाए
जी चाहता है.
(टीप:जी यह भी चाहता है कि फ़िर से बच्चा बन जाऊँ;ज़िन्दगी के उस दौर में लौट जाऊं जो सबसे सुहावन और सुनहरा था;लेकिन अब ऐसा मुमकिन नहीं; तो चलिये ऐसा ही सही कि अपने बचपन की तस्वीर ख़ुद निहारूँ और आप सबको भी दिखलाऊँ...देख लें ऊपर छापी है)