से एक हैं जिन्होंने अल्पायु में अपने गुरू पं.जसराज की गायकी को आत्मसात कर
पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है. मेवाती घराने में बंदिश की ख़ूबसूरती
पर क़ायम रहते हुए गायकी के किलोल से अदभुत तेवर सिरजे जाते हैं।

संजीव की आवाज़ की मिठास जादू और उस पर मेवाती घराने की
गायकी का आसरा । सब कुछ कुछ यूँ सधता है कि हमें अपनी मशीनी जीवन शैली से कोफ़्त
सी होने लगती है.और हाँ इस गायकी की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि छोटी छोटी
तानों को बड़ी सुघड़ता से सँवारा जाता है.जैसे कोई सुन्दरी अपने प्रियतम के स्वागत
में अपनी ड्योढ़ी पर बंधनवार सजा रही हो.
थोड़ा तन्मय होकर सुनेंगे तो महसूस करेंगे कि क्लासिकल मौसिक़ी जब अपने
शबाब पर होती है तब सुनने वाला अपनी सुधबुध खो बैठता है. शास्त्र में ज़्यादा
उतरने की ज़रूरत नहीं..बस स्वर की सृष्टि के भाव-लोक में चले जाइये.....
लौटने को जी नहीं चाहेगा.विलम्बित से शुरू होकर मध्य और द्रुत लय पर
आती आती ये बंदिश कितना कुछ कह जा रही है सुनिये तो.....
ये रतजगा आपको सुरीला ही लगेगा....शर्तिया.
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