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Sunday, April 27, 2008

’गँवई मन और गाँव की याद’

म.प्र. के साहित्य लेखन के गाँधी दादा रामनारायण उपाध्याय सरल,सहज और सात्विक क़लम के कारीगर थे.पं.माखनलाल चतुर्वेदी के खण्डवा के रामा दादा जीवन भर गाँधीवादी सोच में जीते रहे और वैसा ही लिखते रहे.बापू के कहने पर ग्रामीण अंचल में रह कर साहित्य सेवा करने वाले रामा दादा म.प्र.के वरिष्ठ लेखकों की जमात में पहली पायदान के हस्ताक्षर थे.निबंध,कहानी और अपनी छोटी छोटी कविताओं के ज़रिये मानो वे पूरे भारत में बसे ग्रामीण परिवेश का इकतारा बजाते थे.उनकी बहुचर्चित पुस्तक ’गँवई मन और गाँव की याद’ में रचे गए निबंध..मेरे गाँवों की सुख-शांति किसने छीन ली..से संकलित की हैं ये अमृत पंक्तियाँ...

आख़िर गाँवों का सुख और शांति किसने छीन ली ?

किसान के कंठ के गीत कहाँ लुप्त हो गए ? तीज-त्योहार की मस्ती किसने चुरा ली ; दही बिलोने वाली के थिरकन पर अब किसी किसन कन्हैया का मन क्यों नहीं नाचता ? सूरज की पहली किरण अब ग्वाले के हाथ लकुटी क्यों नहीं बनती ? उगता सूरज , अब किसी हल जोतने वाले के मन में अपनी प्रिया के भाल पर लगे कुमकुम की याद क्यों नहीं जगाता ? रात का चाँद अब किसी नववधू की देह में अपने प्रियतम की याद का ताबीज़ बनकर क्यों नहीं चुभता?

किसी घर में लड़की का ब्याह रचाया जाता तो गीत की कड़ियों से हर सुहावने प्रभात और संध्या का स्वागत किया जाता,किसी गीत की अंगुली पकड़कर गणेशजी लड़की वाले का पता पूछते-पूछते विवाह घर आते और एक बुज़ुर्ग की तरह सारे कामों को निर्विघ्न सम्पन्न करवा कर ही लौटते...

लड़की की बिदाई पर पिता के रोने से गंगा में बाढ़ आ जाती.माँ के रोने से आकाश में अंधेरा छा जाता और भाई के रोने से उसकी धोती पाँवों तक भीग जाती.ब्याह के मांगलिक गीतों में मानसरोवर की तरह पिता,भरे पूरे भण्डार की तरह ससुर,बहती गंगा की तरह माँ, भरी पूरी बावडी़ तरह सास, गुलाब के फूल की तरह बच्चे और उगते सूर्य की तरह स्वामी के रूप में ऐसी उद्दात्त कल्पनाएँ सँजोई हैं , जिनको लेकर,हमारा पारिवारिक जीवन समॄध्द होता आया है.

लेकिन अब.....वे गोकुल से सहज , सरल गाँव नष्ट ही होते जा रहे हैं जहाँ स्त्रियाँ बडे भोर में उठकर आटे के साथ घने अंधेरे को भी पीसकर सुहावने प्रभात में बदल देतीं थीं.जहाँ घट्टी के हर फ़ेरे के साथ गीत की नई पंक्तियाँ उठतीं थीं.लगता था जैसी श्रम में से संगीत का जन्म हो रहा है.

अब फ़्लोअर मिल के साथ घर की घट्टी के गीत समाप्त होते जा रहे हैं .ट्रेक्टर के साथ हल के गीतों का लोप होता जा रहा है.खेत की घास को तो हल की नोक से भी उखाड़कर फ़ेंका जा सकता है लेकिन ट्रेक्टर की गहरी जुताई के साथ जिस हल्की और ओछी सभ्यता के बीज बोये जा रहे हैं उन्हें उखाड़ फ़ैकने में कितना समय लगेगा, यह सोचकर ह्र्दय काँप ही उठता है.

मन सोचने पर मजबूर हो जाता है कि खरा परिवेश त्याग कर ये जो सिंथेटिक ज़िंदगी ओढ़ ली है हमने क्या वह वाक़ई हमारे काम की है...परिवेश से परे एक पावन परिवार की कल्पना बेमानी लगती है और दादा रामनारायण की का यह शब्द चित्र मन को बेधता है.