
आज विश्व संगीत दिवस है , बधाई आप सब को।
कामना करता हूँ कि आपकी ज़िन्दगी हर पल सुरीली हो।
लेकिन एक प्रश्न भी आता है मन में कि क्या वाक़ई हमारे
इर्द-गिर्द ऐसे हालात हैं जिन्हें सुरीला कहा जा सके ।जहाँ से
सुर झरना चाहिये वहीं हालत ख़राब है;मेरा इशारा फ़िल्म संगीत
की ओर है जो बरसों से आम आदमी को आनंदित करता आया है।
अब कुछ अपवादों को छोड़ दें तो समकालीन फ़िल्म संगीत से
सुरीलेपन की जुगलबंदी ख़त्म सी होती जा रही है। ए आर रहमान,
शंकर अहसान लॉय,विशाल भारद्वाज और शांतनु मोइत्रा को अपवाद मान लिया जाए,
तो बाक़ी सारे संगीतकार तो शोर ही परोस रहे हैं।
लोग कहते हैं कि जैसा दुनिया चाहती है वैसा ही माल परोसा जाता है।
लेकिन ये बात तो उन लोगों पर लागू होती है जो संगीत को माल और
अपने काम को दुकानदारी मानते हैं। हमने पंकज मलिक,आर सी बोराल,
से लेकर पं रविशंकर तक का कारनामा फ़िल्म दुनिया में देखा - सुना है
और पाया है कि ये सब महान सर्जक अपनी शर्तों पर संगीत बनाते रहे
और ज़माना उनकी रचनाओं को सराहता आया है आज तक।बीच के दौर
के स्वर-रचनाकारों के नाम लेकर मैं आपका क़ीमती वक़्त ज़ाया नहीं करना
चाहता…आप सभी उन नामों के क़ायल हैं और उनका संगीत सुनते,सहेजते
और सराहते हैं।
आज विश्व संगीत दिवस पर दो तीन गुज़ारिश करना चाहता हूँ आपसे…
-समय आ रहा है कि अपने परिवार की नई पीढ़ी को भारतीय शास्त्रीय
संगीत के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी से अवगत करवाएं।
-संभव हो तो (ख़र्चीला सुझाव जो है) अपने संकलन में आठ दस
एलबम्स क्लासिकल म्युज़िक के भी रखें। ज़्यादा हो सकें तो वाह ! क्या बात है।
-शादी – ब्याह में मित्रों और सहकर्मियों को सौ या दो सौ रूपये का लिफ़ाफ़ा
देने की जगह संगीत कैसैट्स और सीडीज़ को भेंट करने का संकल्प लें।
-जो लोग शिक्षण विधा से जुडे हैं वे अपने स्कूलों या कालेजों के कार्यक्रमों
में फ़िल्मी धुनों पर होने वाले एक्शन डांस प्रस्तुतियों के स्थान पर लोक-संगीत
या शास्त्रीय संगीत को प्रोत्साहित करें।
-अपने पारिवारिक आयोजनों में भी (जैसे विवाह के अवसर पर मंगल संगीत) कोशिश
करें कि अपने घर परिवार , परिवेश,बोली का संगीत बजे,यानी लोक-संगीत।
-परिवेश को सुरीला बनाने में गुज़रे ज़माने का संगीत एक बहुत बडी अमानत है।
पचास से लेकर सत्तर तक संगीत सुनना एक अनुभव है।सुनिये और अपने
दफ़्तर और बच्चों के बीच भी बजाइये।
-नई पीढी को पुराने और शास्त्रीय संगीत की ओर लाने के लिये हमें भी उनकी पसंद
के संगीत की ओर जाना पड़ेगा…वहाँ भी कुछ सुरीलापन मौजूद है…उसका आनंद
लीजिये…आपकी इस पहल नई पीढी भी आपकी पसंद के संगीत की ओर आएगी,
मुझे पूरा विश्वास है।
तो आइये…कामना करें कि हम अपने आसपास अपनी हर संभव कोशिशों से सुरीलापन फ़ैलाए। यदि समय मिले तो आज अपने परिवार की नई पीढी के साथ बैठकर कुछ मीठी संगीत रचनाओं का रसपान कीजिये । शुरूआत के लिये यह दिन शुभ है लेकिन संगीत तो ऐसी चीज़ है जो किसी मुहूर्त,दिन,और समय-क्रमका मोहताज नहीं है।
कामना करता हूँ कि आपकी ज़िन्दगी हर पल सुरीली हो।
लेकिन एक प्रश्न भी आता है मन में कि क्या वाक़ई हमारे
इर्द-गिर्द ऐसे हालात हैं जिन्हें सुरीला कहा जा सके ।जहाँ से
सुर झरना चाहिये वहीं हालत ख़राब है;मेरा इशारा फ़िल्म संगीत
की ओर है जो बरसों से आम आदमी को आनंदित करता आया है।
अब कुछ अपवादों को छोड़ दें तो समकालीन फ़िल्म संगीत से
सुरीलेपन की जुगलबंदी ख़त्म सी होती जा रही है। ए आर रहमान,
शंकर अहसान लॉय,विशाल भारद्वाज और शांतनु मोइत्रा को अपवाद मान लिया जाए,
तो बाक़ी सारे संगीतकार तो शोर ही परोस रहे हैं।
लोग कहते हैं कि जैसा दुनिया चाहती है वैसा ही माल परोसा जाता है।
लेकिन ये बात तो उन लोगों पर लागू होती है जो संगीत को माल और
अपने काम को दुकानदारी मानते हैं। हमने पंकज मलिक,आर सी बोराल,
से लेकर पं रविशंकर तक का कारनामा फ़िल्म दुनिया में देखा - सुना है
और पाया है कि ये सब महान सर्जक अपनी शर्तों पर संगीत बनाते रहे
और ज़माना उनकी रचनाओं को सराहता आया है आज तक।बीच के दौर
के स्वर-रचनाकारों के नाम लेकर मैं आपका क़ीमती वक़्त ज़ाया नहीं करना
चाहता…आप सभी उन नामों के क़ायल हैं और उनका संगीत सुनते,सहेजते
और सराहते हैं।
आज विश्व संगीत दिवस पर दो तीन गुज़ारिश करना चाहता हूँ आपसे…
-समय आ रहा है कि अपने परिवार की नई पीढ़ी को भारतीय शास्त्रीय
संगीत के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी से अवगत करवाएं।
-संभव हो तो (ख़र्चीला सुझाव जो है) अपने संकलन में आठ दस
एलबम्स क्लासिकल म्युज़िक के भी रखें। ज़्यादा हो सकें तो वाह ! क्या बात है।
-शादी – ब्याह में मित्रों और सहकर्मियों को सौ या दो सौ रूपये का लिफ़ाफ़ा
देने की जगह संगीत कैसैट्स और सीडीज़ को भेंट करने का संकल्प लें।
-जो लोग शिक्षण विधा से जुडे हैं वे अपने स्कूलों या कालेजों के कार्यक्रमों
में फ़िल्मी धुनों पर होने वाले एक्शन डांस प्रस्तुतियों के स्थान पर लोक-संगीत
या शास्त्रीय संगीत को प्रोत्साहित करें।
-अपने पारिवारिक आयोजनों में भी (जैसे विवाह के अवसर पर मंगल संगीत) कोशिश
करें कि अपने घर परिवार , परिवेश,बोली का संगीत बजे,यानी लोक-संगीत।
-परिवेश को सुरीला बनाने में गुज़रे ज़माने का संगीत एक बहुत बडी अमानत है।
पचास से लेकर सत्तर तक संगीत सुनना एक अनुभव है।सुनिये और अपने
दफ़्तर और बच्चों के बीच भी बजाइये।
-नई पीढी को पुराने और शास्त्रीय संगीत की ओर लाने के लिये हमें भी उनकी पसंद
के संगीत की ओर जाना पड़ेगा…वहाँ भी कुछ सुरीलापन मौजूद है…उसका आनंद
लीजिये…आपकी इस पहल नई पीढी भी आपकी पसंद के संगीत की ओर आएगी,
मुझे पूरा विश्वास है।
तो आइये…कामना करें कि हम अपने आसपास अपनी हर संभव कोशिशों से सुरीलापन फ़ैलाए। यदि समय मिले तो आज अपने परिवार की नई पीढी के साथ बैठकर कुछ मीठी संगीत रचनाओं का रसपान कीजिये । शुरूआत के लिये यह दिन शुभ है लेकिन संगीत तो ऐसी चीज़ है जो किसी मुहूर्त,दिन,और समय-क्रमका मोहताज नहीं है।