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Monday, October 6, 2008

श्रोता की खसलत कार्यक्रम का सत्यानाश कर देती है !

बात थोड़ी लम्बी कह गया हूँ ; यदि दस से पन्द्रह मिनट का समय दे सकते हैं तो ही इसे पढ़ें.हाँ इस पोस्ट में व्यक्त किये गए दर्द को समझने के लिये एक संगीतप्रेमी का दिल होना ख़ास क्वॉलिफ़िकेशन है.

बीते तीस बरसों से तो मंच पर बतौर एक एंकर पर्सन काम कर ही रहा हूँ और उसके पहले भी संगीत की महफ़िलों में जाने का जुनून रहा ही है. सौभाग्याशाली हूँ कि पिता और दादा की बदौलत संगीत का भरापूरा माहौल घर-आँगन में ही मिलता रहा.अब जब से मैं ख़ुद एंकर या सांस्कतिक पत्रकार के रूप में सक्रिय हुआ तब से भाँति भाँति के कलाकारों और उससे भी ज़्यादा सुनने वालों से मिलने,बतियाने और विभिन्न कलाकारों और गायन/वादन की कला के बारे में समझने का अवसर मिल रहा है.संगीत विषय पर पढ़ता भी रहता हूँ सो अच्छा ख़ासा समय संगीत के इर्द-गिर्द चला जाता है या यूँ कहना बेहतर होगा कि मेरे इर्द-गिर्द संगीत होता है.मंच से परे भी कार्य-स्थल और निवास पर भी तक़रीबन पूरे दिन संगीत का संगसाथ बना रहता है.देश के कई कलाकारों से भी लगातार संपर्क में रहता हूँ सो तब भी संगीत की ही चर्चा होती रहती है. यहाँ तक जो बात मैने कही है उसे पढ़कर आपको लग रहा होगा कि मैं आत्ममुग्ध हो अपने को ही महिमामंडित कर रहा है.जी नहीं हुज़ूर नाचीज़ को इस तरह की कोई ग़लतफ़हमी नहीं है कि मैं कोई बड़ा कारनामा कर रहा हूँ ;मामला इतना भर है संगीत मुझे ऑक्सीजन देता है और मुझे इंसान बनाए रखता है. दर असल में कहना कुछ और चाहता हूँ

बहुतेरे अवसरों पर जिन संगीतप्रेमियों से मुलाक़ात होती है उनमें कुछ विशिष्ट प्रजाति के होते हैं.हाँ यह साफ़ करता चलूँ और स्वीकार कर लूँ कि संगीत बहुत सब्जेक्टिव टर्म है यानी तरह –तरह के लोग और तरह तरह् की पसंद.लेकिन अपनी पसंद से भी जो लोग किसी महफ़िल में आते हैं तो वहाँ भी एक विशिष्ट क़िस्म की अतृप्तता महसूस करते हैं.कहने को म्युज़िक सर्कल्स में ये लोग अपने आप को सुर-सुजान कहलवाना पसंद करते हैं लेकिन तबियत में विशिष्ट खसलत लिये हुए होते हैं.उदाहरण के लिये एक सज्जन हैं जो चाहे शायरी की महफ़िल में हों या संगीत की;हमेशा अपनी फ़रमाइश लेकर खड़े हो जाते हैं....एक आयटम ख़त्म हुई; कहेंगे...गिरिजाजी (विदूषी गिरिजा देवी)आज भैरवी ठुमरी के पहले एक चैती ज़रूर होना चाहिये ! ग़ज़ल की महफ़िल है तो जगजीतजी (जगजीत सिंह) आविष्कार फ़िल्म का आपका और चित्राजी वाला बाबुल मोरा सुना दीजिये न प्लीज़....प्रहलादसिंह टिपानिया ने अच्छा-भला माहौल बना रखा है कबीरपंथी गीतों का और आप श्रीमान खड़े हो गए...पेलाद दादा हलके गाड़ी हाँको रे रामगाड़ीवाला सुना दीजिये न ! कलापिनी कोमकली गा रही है जैजैवंती से समाँ बंध गया है और उन्होनें तानपूरे के तार भैरवी के लिये मिलाना शुरू किया ही है और आप जनाब नमूदार हुए हैं महफ़िल में और कहेंगे ...मैडम ! कुमारजी का झीनी झीनी झीनी रे चदरिया तो हुआ ही नहीं......कई बार तो कलाकार सहज होकर उनकी बात सुन लेता है लेकिन कई बार कार्यक्रम ऐसा बेमज़ा होता है कि फ़िर उसके सुरीले होने की आस बाक़ी ही नहीं रहती. तो ये तो हुए मुफ़्त के फ़रमाइशीलाल.जैसे कलाकार सिर्फ़ और सिर्फ़ इन्हें ही अपनी रचनाएँ सुनाने यहाँ आया है.

अब एक दूसरी ब्रीड ऐसी है जो थोड़ी सी सुरीली खसलत वाली है. इनका मामला कुछ यूँ है कि ये श्रीमान गाते हैं...ठीक ठाक ही गाते हैं लेकिन किसी और का गाया पसंद नहीं करते.जैसे पुराने गीतों के किसी कार्यक्रम में बैठे हैं;समझ लीजिये मुकेश या रफ़ी साहब की याद में कोई कार्यक्रम चल रहा है तो ये सभागार में ही अच्छा भला गा रहे गायक की मज़म्मत कर देंगे.यार ! खोया खोया चाँद में रफ़ी साहब वाला फ़ील नहीं आ रहा,नहीं नहीं; मुकेशजी ने सारंगा तेरी याद में ... ऐसे नहीं गाया है अब साहब बताइये रफ़ी और मुकेश वाला ही फ़ील कहाँ से आयेगा,वह तो इन दो महान कलाकारों के साथ ही चला गया न .बात यहीं ख़त्म हो जाती तो ठीक , श्रीमान सभागार में ही पास वाली सीट पर बैठी अपनी श्रीमती को खोया खोया चाँद गाकर सुना रहे हैं;गोया याद दिलाना चाहते हों कि ऐसा था रफ़ी/मुकेश की गायकी का फ़ील (?)पास वाले भी झेल रहे हैं इस (बे)सुरीलेपन को.

एक और ज़ात है इन सुर-सुजानों की , हमेशा किसी आर्टिस्ट को किसी दूसरे से कम्पेयर करेंगे यानी उसकी दूसरे से तुलना करेंगे. जैसे अभी पं.जसराज मेरे शहर में आए थे , लाइव शो था और सुनने वाले थे तक़रीबन दस हज़ार.जैसे ही पहली रचना ख़त्म की श्रीमान मेरे पास आ गए ; यार तुम कैसे झेल पा रहे हो इस शोर शराबे में पंडितजी का गायन (जनाब को मेरी तासीर मालूम नहीं कि मैं तो पण्डितजी जैसे महान कलाकार को सुनने नहीं; देखने के लिये भी भरे बाज़ार में चला जाऊँ) मैंने कहा क्यों ? क्या हुआ ? नहीं यार अपने यहाँ दस साल पहले शरद पूर्णिमा पर भीमसेन जी आए थे; याद है ? मैने कहाँ हाँ ! आहा हा हा...क्या रंग जमा था भिया (मेरे शहर में भैया को भिया कहते हैं) वह बात नहीं बना पाए हैं जसराज आज . क्या लचर गा रहे हैं . मैने उनसे बहस करना ठीक नहीं समझा और मशवरा दिया कि ये तो आजकल ऐसा ही गा रहे हैं,शहर में विख्यात गायक शान का लाइव शो भी चल रहा है , सुना है वहाँ काफ़ी रंग जम रहा है. भाई साहब बोले क्या बात कर रहे हो..जगह मिल जाएगी, मैने कहा हाँ शायद मिल ही जाए,आप एक बार ट्राय तो कीजिये....सुर सुजान चलते बने और मैने राहत की साँस ली.अब आप बताइये कितना ग़लत है किसी कलाकार की गायकी की किसी और से तुलना करना.सबका अपना अपना रंग है,घराना है,गुरूजन अलग अलग हैं,परम्पराएँ भी अलग.
पर नहीं उनको तो जसराज जी में भीमसेन जी का रंग चाहिये.मज़ा ये है कि भीमसेन जी से पूछिये तो वे जसराजजी की तारीफ़ करेंगे और जसराज जी के सामने भीमसेनजी की चर्चा चलाइये तो वे कहेंगे भीमसेनजी की क्या बात है.

इसी स्टाइल में एक और गौत्र वाले साह्ब भी हैं . वे क्या करते हैं कि जैसे आज प्रभा अत्रे को सुन रहे हैं तो कहेंगे भाई साहब पिछले साल पुणे के सवाई गंधर्व में जो इन्होंने बागेश्री सुनाई थी वह बात आज सुनाई नहीं दे रही है.मैं सोचता हूँ कि ये ऐसी बेवकूफ़ी की बात क्यों कर रहे हैं .हर दिन अलग होता है, मूड अलग होता है , आख़िर कलाकार भी तो इंसान है.याद आ गई उस्ताद बिसमिल्ला ख़ाँ साहब से बरसों पहले स्पिक मैके की वह महफ़िल जब ख़ाँ साहब बोले थे राग, रसोई , पागड़ी(पगड़ी) कभी-कभी बन जाए. बाद में समझ में आया कि श्रीमान आपको बताना चाहते हैं कि पिछले साल भी ये भी सवाई गंधर्व समारोह सुनने पुणे गए थे.


आज ये आलेख लिखते लिखते मुझे मेहंदी हसन साहब की याद आ गई. बरसों पहले वे एक शो के लिये मेरे शहर में तशरीफ़ लाए थे .शो का समय था रात आठ बजे का. ख़ाँ साहब साढ़े छह बजे आ गए,साज़ मिलवा लिये यानी ट्यून करवा लिये,साउंड का बेलेंसिंग कर लिया और फ़ारिग़ हो गए तक़रीबन सात बजे.फ़िर मुझसे कहा कोई कमरा है ग्रीन रूम के पास ऐसा जो ख़ाली हो,मैने पूछा क्या थोड़ा आराम करेंगे ? बोले नहीं शो शुरू होने के पहले जब तक मुमकिन होगा ख़ामोश रहना चाहता हूँ.मैं उन्हें एक कमरे में ले गया.वहाँ दरवाज़ा भीतर से बंद कर बैठा ही था तो बाहर से किसी ने खटखट की.दरवाज़ा खोला तो सामने आयोजन से जुड़े एक शख़्स खड़े थे , बोले कमिश्नर साहब आए हैं मिलना चाहते हैं मेहंदी हसन साहब से.मैने कहा वे अब शो प्रारंभ होने तक बोलेंगे नहीं , आप उन्हें शो के बाद मिलवाने ले आइये मैं ज़िम्मेदारी लेता हूँ कि ख़ाँ साहब से मिलवा दूँगा.जनाब कहने लगे आप समझते नहीं हैं साहब उखड़ जाएंगे,मैने कहा कहाँ हैं साहब और कमिश्नर से मिलने चला. मैने उन्हें हक़ीक़त बताई; वे एक संजीदा इंसान थे,बोले नहीं मैं नहीं मिलना चाह रहा, मेरी बेटी को ऑटोग्राफ़ चाहिये था.मैने उनकी बेटी की ऑटोग्राफ़ बुक ली और आश्वस्त किया कि उनका काम हो जाएगा.वे तसल्ली से श्रोताओं में जाकर बैठ गये.कमरे में लौटा तो देखा उस्तादजी जैसे ध्यान मुद्रा में बैठे थे. आँखों से अश्रु बह रहे थे. ख़ाँ साहब की टाइमिंग देखिये ठीक पौने आठ बजे उन्होंने आँखें खोलीं और मेरी तरफ़ देख कर मुस्कुराए; कहने लगे चलें जनाब दुकान सजाएँ.मैंने कहा हाँ चलते हैं लेकिन ख़ाँ साहब ये पैतालिस मिनट की ये ख़ामोशी क्या थी. बोले भाई मेरे आज जो जो ग़ज़ले गाने का मन बनाया है उनके मुखड़ों से दुआ-सलाम कर रहा था.फ़िर मैने पूछा कि इस दौरान आँखें क्यों भींज गईं थी आपकी ?ख़ाँ साहब बोले हाँ भाई उस वक़्त ख़ुदा का शुक्रिया अदा कर रहा था कि परवरदिगार तू कितना रहमदिल है कि मुझ नाचीज़ से मौसीक़ी के ज़रिये अपनी ख़िदमत करवा रहा है.सोचिये मेहंदी हसन साहब जैसा बड़ा आर्टिस्ट भी अपने आप से गुफ़्तगू के रूप में थोड़ा सा होमवर्क करना चाहता है.ऐसे में कोई सिरफ़िरा श्रोता एक महान कलाकार का ये नाज़ुक वक़्त चुरा कर कितना बड़ा पाप कर सकता है.कहने की ज़रूरत नहीं कि वह रात मेहंदी हसन साहब की गायकी की एक आलातरीन रात थी.ऐसी जो कभी कभी गाई जाती है बड़े नसीब से सुनने को मिलती है.

मुझे लगता है कि श्रोता हर तरह से अपनी पसंद/नापसंद तय करने का अधिकार रखता है . बल्कि ये उसका हक़ है लेकिन सच्चा और खरा श्रोता सजग,संवेदनशील और सह्रदय होता है..वह जानता है न जाने कितने तप और रियाज़ के बाद कोई कलाकार अपनी प्रस्तुति को लेकर पूरी उम्मीद के साथ आपसे रूबरू होता है. आपकी थोड़ी सी भी नासमझी कलाकार के पूरे मूड को बिगाड़ सकती है. अब बताइये साहब कि संगीत की महफ़िल में कोई बड़बोला , फ़रमाइशीलाल अपनी कोई फ़रमाइश लेकर कलाकार को डिस्टर्ब कर दे तो क्या हो.या कोई फ़ैन ऑटोग्राफ़ लेने के लिये गायक को परेशान करे ये तो ठीक नहीं.ईमानदार श्रोता वह है जो रहमदिल होकर कलाकार की तपस्या का मान करे और सह्र्दय होकर उसकी कला को दाद देकर उसे नवाज़े; उसका हौसला बढ़ाए.


कभी ठंडे दिल से सोचियेगा कि क्या मै ठीक कह रहा हूँ.

Tuesday, April 22, 2008

किसी कंसर्ट को श्रोता/दर्शक भी सफल बनाता है !

बातें कुछ हैं जिनका आपको किसी भी महफ़िल में

शिरकत करते वक़्त ध्यान रखना चाहिये...





-कोशिश कीजिये कि निमंत्रण पत्र में जो समय दिया गया है आप उस टाइम पर सभागार में पहुँचें.

-यदि सभागार में बैठक की कुछ पंक्तियों को आरक्षित किया गया है तो उसका अनुसरण कीजिये आयोजक ने सभागार में कुछ वालेंटियर या सदस्य नियुक्त किये हैं बैठक व्यवस्था को सम्हालने के लिये तो प्लीज़ उनकी बात और उनके निर्देश मानिये.वे कुछ बेहतर करने के लिये ही वहाँ मौजूद रहते हैं.

-कार्यक्रम प्रारंभ होने के बाद आपके मोबाइल की घंटी बजना एक बेहूदी हरक़त है इसे स्पष्ट रूप से जान लीजिये....कलाकार या वक्ता जिस तैयारी से अपनी बात कहना चाहता है ..उसे आपके मोबाइल की घंटी से निश्चित रूप से ख़लल पड़ता है.ध्यान रखिये मोबाइल फ़ोन बनाने वालों ने हैण्डसेट में साइलेंट मोड इसीलिये दिया है कि बिना आवाज़ भी मोबाइल की सुविधा का फ़ायदा लिया जा सके ..बिना किसी को डिस्टर्ब किये...हाँ एक खा़स बात और....साइलेट मोड पर रखे मोबाइल पर यदि फ़ोन आया हो तो भगवान के लिये हाँल के बाहर जाकर बात कीजिये..सभागार में कुर्सी पर बैठे-बैठे नहीं.

-आपको लगता है कि कार्यक्रम का विषय ऐसा है जो आपके बच्चों की समझ और विवेक की हद के बाहर का है उन्हे साथ ले जाना ठीक नहीं

-कार्यक्रम यदि शुरू हो गया है और आप देर से पहुँचे हैं तो कृपया बहुत खा़मोशी से अपनी जगह तक पहुँचिये.आपके निमंत्रण पत्र में यदि सीट नम्बर उल्लेखित नहीं है और हाँल में कहीं भी बैठ जाने की आज़ादी है तो भी पीछे जहाँ जगह मिल जाए वहीं बैठ जाना समझदारी होगी.नाहक ही आगे जाने का लोभ मत कीजिये..दूसरे श्रोता-दर्शकों के मज़े और तन्मयता में ख़लल पडता है.

-संगीत के कार्यक्रम के कार्यक्रमों में अक्सर देखा गया है कि यदि कोई कलाकार बहुत अच्छा गा रहा है तो आप ख़ुश होकर एक नये गीत की फ़रमाइश कर बैठते हैं..बुरा नहीं इसमें कुछ ..लेकिन हो सकत उस कलाकार ने आपका फ़रमाइशी गीत तैयार न किया हो.हाँ एक बड़ी संभावना ये भी है कि कलाकार वह गीत या धुन या राग तो गाना/बजाना जानता हो लेकिन उसके संगतिकार उस रचना के लिये एकदम तैयार न हों...ये सोचना भी लाज़मी है कि आपसे एक बार दाद या प्रशंसा पा चुका कलाकार कोई भी कमज़ोर प्रस्तुति आपके सामने नहीं देना चाहेगा..इसमें यह भी नोट कर लें कि हर कलाकार अपने प्र्स्तुति के दिन के लिये एक खा़स मूड में होता है और उसी के मुताबिक तय करता है कि आज मुझे क्या गाना है और क्या नहीं...उसकी अपनी सोच होती है और विवषताएं भी.उदाहरण के लिये मान लीजिये कि आपने जिस गीत रचना की फ़रमाईश की है उसमें कोई खा़स वाद्य बजता है जैसे बाँसुरी ..अब आपके शहर में आते वक़्त कलाकार अपने साथ बाँसुरी वादक साथ नहीं लाया है तो भला वह कैसे आपकी फ़रमाइश पूरी करे.हाँ आप ये ज़रूर कर सकते हैं कि कार्यक्रम स्थल पर निर्धारित समय से थोडा़ जल्दी पहुँचकर कार्यक्रम आयोजक या कलाकार के मैनेजर/सहयोगी को फ़रमाइशी रचना एक काग़ज़ पर अपने नाम सहित दे दीजिये..मेरी बात पर यक़ीन करिये ...ऐसा करने से कलाकार को आपकी फ़रमाइश को पूरा करने का मन बनता है. कलाकार को भी यथासमय फ़रमाइश मिल जाए तो उसे प्रसन्नता होती है.

-यदि सभागार या कार्यक्रम में खाने-पीने की चीज़ें ले जाने पर मनाही है तो मत ले जाईये..हम ये उम्मीद तो करते हैं कि हाँल साफ़-सुथरे हों लेकिन ऐसा हो उसके लिये हमें भी तो सहयोग करना होगा.

-कार्यक्र्म में सामुहिक रूप से ठहाके लग रहे हों या तालियाँ बज रही हों तो आप ज़रूर उसमें शामिल हो जाइये लेकिन उसके अलावा इस बात का विशेष ध्यान रखें की आप अपने परिजनों से इतनी ऊंची आवाज़ में बात न करें जिससे अन्य श्रोताओं/दर्शकों को तकलीफ़ हो.

-कविता और शायरी के आयोजन दाद या आपके प्रतिसाद से ही सफल होते हैं ..इसलिये वहाँ ज़रूर दाद/प्रतिसाद दीजिये ..क्योंकि कविता/शायरी जैसा संवाद (communication) है से पूर्णता पाता है.

मैने ये सारी बातें एक श्रोता,दर्शक,आयोजक,एंकर पर्सन,सलाहकारऔर समीक्षक के रूप में जाँची,परखी और आज़माई है और महसूस किया है कि कलाकार की प्रतिभा,परिश्रम और उसके सितारा स्टेटस के बावजूद कई कार्यक्रम इसलिये असफल हो जाते हैं कि वहाँ दर्शक/श्रोता अपनी सार्थक और रचनात्मक भूमिका निभा पाता...सच मानिये किसी भी क़ामयाब कार्यक्रम में आपकी भूमिका किसी से कम नहीं

Monday, July 16, 2007

पं.कुमार गंधर्व बोले...गाना तो बाहर क्या देखना ?


मालवा और कुमार गंधर्व जैसे दूध में मिश्री.हमारा मालवा दूध जैसा पावन और हमारे कुमारजी का गाना मिश्री जैसा मीठा.धारावाहिक रामायण की लोकप्रियता शबाब पर थी.मुंबई में किसी म्युज़िकल सर्कल में सुबह की महफ़िल जमी है.रामायण के कारण खचाखच रहने वाली महफ़िल पर भी असर है आज.फ़िर भी सुनने वालों में कुमारजी के स्थायी मुरीद तो हैं हीं.लाजवाब गाया है आज कुमार जी. सभा समाप्त हुई है..मिलने जुलने वाले,शिष्य परिवार,और हाँ रेलेजी,पंढरीनाथ कोल्हापुरे और सबसे विशिष्ट हैं मराठी के जाने-माने साहित्यकार और कुमारजी के अनन्य सखा पु.ल.देशपांडे.ग्रीन रूम में आकर मराठी में पूछ रहे हैं ..कुमार आपने तो यहाँ जब भी गाया है तब सैकड़ों श्रोता रहे हैं..आज मामला ख़ाली ख़ाली था तब भी आपका गाना तो अदभुत था...कैसे?...दिल थाम कर पढ़ लीजिये दोस्तो पं.कुमार गंधर्व का जवाब..और ये भी ध्यान रहे कि ऐसे जवाब में काफ़ी कुछ अव्यक्त है...कृपया उसे पकड़्ने की कोशिश करियेगा.कुमार जी बोले:
जब गाना तो बाहर क्या देखना...मै गाने को अपने भीतर को सुनाता हूं..किसी और को सुनाने आया ही नहीं कभी .

Thursday, July 5, 2007

शहनाई और खु़दाई


शहनाईनवाज़ उस्ताद बिसमिल्लाह खा़न साहब न केवल महान संगीतकार थे बल्कि एक सूफ़ियाना तबियत के इंसान भी थे . उनका फ़क्कड़्पन और सादगी उनके संगीत से कहीं ऊंची थी .उनके इन्तेक़ाल के ठीक बाद इक शब्द-चित्र लिखने का मौक़ा मिला था.छपने के बाद कई प्रतिक्रियाएँ मिलीं जिनमें से एक थी मध्य-प्रदेश के जाने वैद्यराज पं.रामनारायण शास्त्री के सुपुत्र शी महेशचंद्र शास्त्री की.यह प्रतिक्रिया इसलिये विशिष्ट थी क्योंकि उसमें महेशजी के पूज्य पिता से जुड़ा़ एक सच्चा वाक़या था.संगीतप्रेमियों और ख़ाँ साहब के मुरीदों के लिये उस पत्र से वह संस्मरण जस का तस यहाँ....

इन्दौरी के भंडारी मिल में उस्ताद का शहनाई वादन चल रहा था.पू.पिताजी (पं.रामनारायणजी शास्त्री) ने कार्यक्रम समापन के बाद् ख़ाँ साहब से कहा...आपके वादन से श्रोता को तो अलौकिक अनुभूति होती है...आपको कैसा लगता है?

उस्ताद बोले: खुदा की खु़दाई दिखाई देती है

Monday, May 28, 2007

एम्.एस.सुब्बुलक्ष्मी के स्वर मे मीरा की वेदना



आईये आज उस मीरा की चर्चा कर ली जाए जिसको पूरे विश्व ने न केवल गाते देखा बल्कि उसके अलौकिक स्वर का रस भी चखा है. मेरा इशारा सुधिजन तो समझ ही गये होंगे. दक्षिण की इस अदभुत स्वर कोकिला को कौन नहीं जानता.....जी हुज़ूर मै एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी की ही बात कर रहा हूं..जिन्हे भारतरत्न जैसे सर्वोच्च नागरिक अलंकरण से नवाज़ा गया था. मै अपने इस चिट्ठे के ज़रिये आपके साथ यह सत्य बांटना चाहता हूं कि सुरों की गंगा बहाने वाली एम.एस.की निजी ज़िंदगी बहुत मुश्किलों से भरी थी. वे देवदा़सी प्रथा से आईं थीं और उनकी मां ने एम.एस. का विवाह दक्षिण भारत के एक बडे़ राज-परिवार शे ताल्लुक रखने वाले शख़्स से करने वालीं थीं .बहुत कम लोगों को मालूम है कि एम.एस दक्षिण के एक जाने-माने कलाकार से अगाध प्रेम करतीं थीं ..उनके प्रेम पत्रों के भाव पूर्ण अंश पढने लायक हैं.कालान्तर में एम.एस. एक नामचीन कला-पत्रकार के संपर्क में आईं और उनके साथ ही जीवनपर्यंत जुड़ी रहीं एम.एस का करियर निखारने में इस गांधीवादी पत्रकार का बहुत बड़ा योगदान है. रेखांकित करने वाली बात यह है कि ये पत्रकार विवाहित थी और दो बेटियों के पिता भी थे.एम.एस. अपनी मां के क्रूर रवैये से परेशान होकर इनके पास चली आईं थी. इस दबंग पत्रकार ने एक तरह से एम.एस. को अपने घर में शरण दी और एक तारिका के रूप में इस स्वर विदुषी को स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया. ज़ाहिर है उनका खुद का दांपत्य एक खू़बसूरत कलाकार के घर में आ जाने से संकट में आ गया था.ये वरिष्ठ पत्रकार महोदय अपने समय के अत्यंत प्रभावी व्यक्ति थे.कला और फ़िल्म क्षेत्र में उनका ज़बरद्स्त दबदबा था...उन्होने एम.एस.के लिये सारे प्रभावों का इस्तेमाल किया.एम.एस. ने एक सच्ची गृहस्थिन की तरह अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वाह किया.आप जानकर रोमांचित होंगे कि एम.एस. ने अपने पति के लिये न केवल अपने प्रेम को दांव पर लगाया किंतु उनकी पुत्रियों की एक मां की तरह परवरिश की. फ़िल्म मीरा में एम.एस.ने मीरा का स्वांग धरा बल्कि सुमधुर मीरा गीतों का गान भी किया.आधुनिक मीरा के रूप में हम संगीतप्रेमी जिन दो आवाज़ों से वाकिफ़ हैं संयोग से दोनो अहिन्दीभाषी हैं...एम.एस.सुब्बुलक्ष्मी (दक्षिण भारत ) और जुथिका राय (बंगाल)एम.एस.के स्वरों की पवित्रता का प्रवाह हमारे कानों से ह्रदय में उतरकर हमारे मन को वृंदावन बना देता है. मीरा के पद जैसे उनके कंठ से झर कर हमारे पापों का नाश कर देते हैं.वे दु:ख नाशिनी बन कर मानों हमारी नैया को पार लगा देतीं हैं.एम.एस. का स्वर क़ायनात का पवित्रतम स्वर है.अब जब भी एम.एस.सुब्बुलक्षमी को सुनें तो उनके संघर्ष और भोगे गये यर्थाथ को भी याद करें ..आपको लगेगा मीरा के पदों के पीछे एक और मीरा रस घोल रही है।
आइये कानों को देते हैं वह पुण्य-प्रसाद जो अलौकिक सुर बन कर पूरे ब्रम्हांड पर छाया है.सुब्बुलक्ष्मी फ़िल्म मीरा में स्वयं मीरा का किरदार निभा रहीं हैं यह वाक़ई एक दुर्लभ वीडियो है आपके लिये..

Sunday, April 15, 2007

अल्लाह के बन्दे हैं कैलाश खेर


कैलाश खेर जैसे कलाकार को सुनाना एक अनुभव गुजरना है . सोचकर हैरत होती है कि तथाकथित celebrity culture में ये बन्दा इतना simple and modest कैसे रह सकता है.आवाज़ में बला का सा तूफ़ान और संगीत की लाजवाब पकड़ इस artist को भीड़ से अलग बनाती है.कैलाश खेर जिनका अल्बम कैलासा इनदिनों चर्चा में है ;यूँ ही कामयाबी नही हासिल कर ली है.उत्तरप्रदेश के मेरठ में जन्मे कैलाश ने छोटी सी ज़िंदगी में बहुत संघर्ष किया है.दिल्ली में रहकर कैलाश ने पं मधुप मुदगल जैसे गुणी कलाकार से तालीम हासिल की । वैसे कैलाश को सुनाने की बाद लगता नहीं कि उन्हें किसी तालीम की ज़रूरत पड़ी होगी। वे तो मास्टर मदन, कुमार गन्धर्व या लता मंगेशकर की तरह ऊपरवाले द्वारा बना कर भेजे गये हैं। advertising jingles गाकर मुम्बई में अपने career का आगाज़ करने वाले कैलाश का संगीत और स्वर आज फ़िज़ाओं में महक रह है तो इसके पीछे उनकी ईश्वर के प्रति अगाध आस्था और स्वभाव की विनम्रता है। फिल्म मंगल पांडे और सलाम इश्क मे गाये गीतों से मिली शोहरत के अलावा कैलाश खेर के प्रायवेट एलबम उन्हें खासी लोकप्रियता दीं है। अल्ला के बन्दे जैसे गीत के बाद कैलाश खेर संगीतप्रेमियों का दुलारा कलाकार बन गया है.सफलता के बावजूद कैलाश खेर अतीत भूले नहीं हैं और स्वीकार करते हैं कि श्रोताओं से मिला प्यार ही उनकी आवाज़ से झरता है.

Saturday, April 7, 2007

पं ह्रदयनाथ मंगेशकर को लता अलंकरण-२००६

इन्दौर में जन्मी महान गायिका लता मंगेशकर के नाम से मध्य प्रदेश की सरकार ने सुगम संगीत विधा में काम करने वाले गायकों और संगीतकारों के लिये लता मंगेशकर अलंकरण स्थापित किय था सन १९८४ में. २००६ का सम्मान पं.ह्र्दयनाथ मंगेशकर को दिया गया है.पं मंगेशकर लताजी के छोटे भाई और जानेमाने संगीतकार हैं.फ़िल्म लेकिन में उनका संगीतबद्द किया हुआ गीत ...यारा सिली सिली तो आपने सुना ही होगा...फ़िल्म धनवान में भी पं.मंगेशकर का एक गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था....ये आंखें देखकर हम सारी दुनिया भूल जाते हैं. संगीतरसिकों के लिय ह्र्दयनाथजी का सबसे बडा कारनामा है..लताजी कि आवाज़ में कम्पोज़ किये गये दो बेशकीमती एलबम...गालिब और मीरा(चाला वाही देस )
ये एलबम तब आए थे जब प्रायवेट एलबम्स के लिय कोई बडा बाज़ार नहीं था.पं.ह्र्दयनाथ जी ने मराठी संगीत की दुनिया में भी अप्रतिम काम किया है...मी डोलकर डोलकर..डोलकर दरिया चा राजा.
उनकी हस्ताक्षर रचना है. अपनी महान बहन लता के नाम से स्थापित सम्मान सिर्फ़ पं.मंगेशकर का नहीं पूरे परिवार का सम्मान है जिसमें ह्रदयनाथजी कि पिता पं दीनानाथ जी,लताजी,आशाजी,उषाजी और मीनाजी शामिल हैं. सनद रहे पं.ह्रदयनात मंगेशकर स्वयं एक बेहतरीन गायक हैं और इंदौर घराने के मशहूर उस्ताद अमीर खां साहब के शागिर्द है.