
उनकी मौजूदगी और आवाज़ से ही
धूजनी चल जाती थी.
उनका आदेश यानी पत्थर की लकीर
उनसे ज़्यादा जानकारी किसी और को हो ही नहीं सकती थी.
वे थे एक स्कूल
एक संस्था...
तहज़ीब,संगीत,भूगोल और न जाने कितनी
औषधियों के
वे नाम के पिता नहीं थे
उनके ठसके और रूतबे में झलकता था
पिता का आभामंडल
वे मेरे पिता के पिता थे.
मैने अपने पिता को उनके सामने
सोते नहीं देखा
हमेशा चाक-चौबंद
अपने पिता की बात को ध्यान से सुनते पाया.
समय बदला
मैं बड़ा होने लगा
अपने पिता से तो रहा पहले सहमा-सहमा
उनके आग्रह को आदेश मानता सा
उन्होंने कह दिया सो कह दिया
हिम्मत नहीं हुई
समय के अनुशासन को तोड़ने की
कह दिया इतनी बजे लौटूंगा...आ गया
कभी जूते ख़रीदना चाहा तो जवाब मिला
दशहरे पर दिलवाएँगे...ख़ुश हो गया
चलो त्योहार मज़े से मनाएंगे.
फ़िर किशोर से जवान हुआ
अपना मत और मन बनाने लगा
लेकिन व्यक्त करने में थोड़ा डरा डरा सा.
फ़िर भी उनसे थोड़ी आज़ादी तो ले ही ली
कामकाज की,अपनी तरह से रहने की
उनसे सीखा ज़माने का दस्तूर
कैसे सम्हालो अपने आपको
बचाओ पैसे,मत करो फ़िज़ूलख़र्ची
उन्होंने सिखाया सुनने, बोलने,लिखने का सलीक़ा
उनकी नसीहतों और मशवरे से आबाद है मेरी ज़िन्दगी
फ़िर मेरी शादी हो गई
अब मैं दो बच्चों का बाप हूँ..
अब इस बदले समय की व्यथा - कथा भी सुन लें
मेरा बेटा बड़ा हो गया है
कभी ठिठोली करता
कभी बेपरवाह होकर अपनी फ़रमाईश करता
जब-तब अपनी माँ से पैसे लेकर ख़रीद लाता है
जूते,कपड़े,गॉगल्स,बेल्ट,कैप, आईपॉड और मोबाईल
उसे नहीं चाहिये प्रेमचंद का गोदान,नागर का मानस का हँस
और शिवाजी सावंत का मृत्युंजय
नहीं चाहिये उसे गंडेरियाँ,गर्म मूँगफ़ली या सिके भुट्टे
नहीं चाहिये उसे ओंकारनाथ ठाकुर,गिरजा देवी,रसूलन बाई,
ज्युथिका राय,पंकज मलिक,सहगल,सुरैया
की आवाज़ जिन पर मेरा दिल क़ुरबान रहता है
वह अपनी बर्गर,पित्ज़ा और डिस्को थैक की दुनिया में
बहुत ख़ुश रहता है
वह आग्रह नहीं करता
आदेश ही करता है
कब आता है
कब जाता है
मुझे मालूम नहीं
उसके दोस्त कौन हैं
क्या करते हैं...
औषधियों के
वे नाम के पिता नहीं थे
उनके ठसके और रूतबे में झलकता था
पिता का आभामंडल
वे मेरे पिता के पिता थे.
मैने अपने पिता को उनके सामने
सोते नहीं देखा
हमेशा चाक-चौबंद
अपने पिता की बात को ध्यान से सुनते पाया.
समय बदला
मैं बड़ा होने लगा
अपने पिता से तो रहा पहले सहमा-सहमा
उनके आग्रह को आदेश मानता सा
उन्होंने कह दिया सो कह दिया
हिम्मत नहीं हुई
समय के अनुशासन को तोड़ने की
कह दिया इतनी बजे लौटूंगा...आ गया
कभी जूते ख़रीदना चाहा तो जवाब मिला
दशहरे पर दिलवाएँगे...ख़ुश हो गया
चलो त्योहार मज़े से मनाएंगे.
फ़िर किशोर से जवान हुआ
अपना मत और मन बनाने लगा
लेकिन व्यक्त करने में थोड़ा डरा डरा सा.
फ़िर भी उनसे थोड़ी आज़ादी तो ले ही ली
कामकाज की,अपनी तरह से रहने की
उनसे सीखा ज़माने का दस्तूर
कैसे सम्हालो अपने आपको
बचाओ पैसे,मत करो फ़िज़ूलख़र्ची
उन्होंने सिखाया सुनने, बोलने,लिखने का सलीक़ा
उनकी नसीहतों और मशवरे से आबाद है मेरी ज़िन्दगी
फ़िर मेरी शादी हो गई
अब मैं दो बच्चों का बाप हूँ..
अब इस बदले समय की व्यथा - कथा भी सुन लें
मेरा बेटा बड़ा हो गया है
कभी ठिठोली करता
कभी बेपरवाह होकर अपनी फ़रमाईश करता
जब-तब अपनी माँ से पैसे लेकर ख़रीद लाता है
जूते,कपड़े,गॉगल्स,बेल्ट,कैप, आईपॉड और मोबाईल
उसे नहीं चाहिये प्रेमचंद का गोदान,नागर का मानस का हँस
और शिवाजी सावंत का मृत्युंजय
नहीं चाहिये उसे गंडेरियाँ,गर्म मूँगफ़ली या सिके भुट्टे
नहीं चाहिये उसे ओंकारनाथ ठाकुर,गिरजा देवी,रसूलन बाई,
ज्युथिका राय,पंकज मलिक,सहगल,सुरैया
की आवाज़ जिन पर मेरा दिल क़ुरबान रहता है
वह अपनी बर्गर,पित्ज़ा और डिस्को थैक की दुनिया में
बहुत ख़ुश रहता है
वह आग्रह नहीं करता
आदेश ही करता है
कब आता है
कब जाता है
मुझे मालूम नहीं
उसके दोस्त कौन हैं
क्या करते हैं...
पूछो तो कह कर निकल जाएगा
.....मिलवा दूंगा किसी दिन आपको डैड.
डोंट वरी
लेकिन मैं बेबस सा नहीं
इन सब बातों को ख़ुशी ख़ुशी सहने और सुनने का आदी हो गया हूँ
ज़माना जो बदल गया है....मुझे भी बदलना होगा.
एक बड़ा फ़र्क़ और आया है
डोंट वरी
लेकिन मैं बेबस सा नहीं
इन सब बातों को ख़ुशी ख़ुशी सहने और सुनने का आदी हो गया हूँ
ज़माना जो बदल गया है....मुझे भी बदलना होगा.
एक बड़ा फ़र्क़ और आया है
मैं इम्तिहान देने जाता था तो
पिता के पैर छूकर जाता था
मेरा बेटा
मुझसे गले मिल कर कहता है
बाय डैड
मुझे लगता है सब ठीक ही हो रहा है
मेरा,उसके दादा और परदादा के
समय का अक्स अपने बेटे में देखना
शायद ग़लत ही होगा न ?
(तस्वीर में साहबज़ादे ही हैं मेरे साथ)