ज़रा एक नज़र तो डालिये मेरे शहर के गरबे के सूरते हाल पर....
चौराहों पर लगे प्लास्टिक के बेतहाशा फ़्लैक्स।
गर्ल फ़्रैण्डस को चणिया-चोली की ख़रीददारी करवाते नौजवान
देर रात को गरबे के बाद (तक़रीबन एक से दो बजे के बीच) मोटरसायकलों की आवाज़ों
के साथ जुगलबंदी करते चिल्लाते नौजवान
घर में माँ-बाप से गरबे में जाने की ज़िद करती जवान लड़की
गरबे के नाम पर लाखों रूपयों की चंदा वसूली
इवेंट मैनेजमेंट के चोचले
रोज़ अख़बारों में छपती गरबा कर रही लड़के-लड़कियों की रंगीन तस्वीरें
देर रात गरबे से लौटी नौजवान पीढी न कॉलेज जा रही,न दफ़्तर,न बाप की दुकान
कानफ़ोडू आवाज़ें जिनसे गुजराती लोकगीतों की मधुरता गुम
फ़िल्मी स्टाइल का संगीत,हाइफ़ाई या यूँ कहे बेसुरा संगीत
आयोजनों के नाम पर बेतहाशा भीड़...शरीफ़ आदमी की दुर्दशा
रिहायशी इलाक़ों के मजमें धुल,ध्वनि और प्रकाश का प्रदूषण
बीमारों,शिशुओं,नव-प्रसूताओं को तकलीफ़
नेतागिरी के जलवे ।मानों जनसमर्थन के लिये एक नई दुकान खुल गई
नहीं हो पा रही है तो बस:
वह आराधना ...वह भक्ति जिसके लिये गरबा पर्व गुजरात से चल कर पूरे देश में अपनी पहचान बना रहा है। देवी माँ उदास हैं कि उसके बच्चों को ये क्या हो गया है....गुम हो रही है गरिमा,मर्यादा,अपनापन,लोक-संगीत।
माँ तुम ही कुछ करो तो करो...बाक़ी हम सब तो बेबस हैं !