Saturday, June 7, 2008

जब नहीं होती दिलों में दूरियाँ तब ज़रूरत नहीं पड़ती चिल्लाने की !

शिक्षक अपनी कक्षा में पढ़ा रहे थे और शिष्य ध्यान लगाकर उनकी बात सुन रहे थे। उसी समय बाहर से ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़े आने लगीं जैसे कोई झगड़ा हुआ हो। उत्सुक शिक्षक और विद्यार्थी कक्षा छोड़ कर बाहर आए। देखा कि विद्यालय के ही दो कर्मचारी तू-तू, मैं-मैं करते हुए ऊँची आवाज़ में लड़ रहे थे और उनके आसपास भीड़ जमा थी। प्राचार्य महोदय भी वहॉं पहुँचे और उनके बीच-बचाव के बाद विवाद समाप्त हुआ।'

शिक्षक और उनके विद्यार्थी पुनः अपनी कक्षा में पहुँचे पर झगड़े का दृश्य देख कर उन सबका मन ख़राब हो गया था। एक विद्यार्थी ने पूछ ही लिया, "सर, वो दोनों इतनी ज़ोर-ज़ोर से क्यों चिल्ला रहे थे ? इतनी पास से तो धीमी आवाज़ भी सुनी जा सकती थी ? इस पर शिक्षक ने जवाब दिया, "जब किसी को किसी पर ज़ोर से क्रोध आता है तो उन दोनों के दिलों के बीच की दूरियॉं बहुत बढ़ जाती हैं। जब दूरियॉं बढ़ जाती हैं तो ना कुछ दिखाई पड़ता है, ना सुनाई पड़ता है। आवाज़ बहुत ऊँची हो तो ही शायद सुन सकते हैं। यही कारण है कि लड़ने वाले चिल्ला-चिल्ला कर बात करते हैं।

शिक्षक ने अपनी बात को और आगे बढ़ाया, "तुम लोगों ने देखा होगा कि जब दो व्यक्तियों में संबंध अच्छे रहते हैं तो वे धीरे-धीरे बात करते हैं और एक-दूसरे की बात इसलिए सुन पाते हैं क्योंकि उनके दिलों के बीच की दूरी बहुत कम होती है और बात उन तक ठीक से पहुँचती है। जब हम किसी से बेहद प्यार करते हैं तो दिलों के बीच कोई दूरी नहीं रहती और कान में फुसफुसाने भर से हमारी बात पहुँच जाती है। जब दो दिल और भी क़रीब होते हैं तो कई बार कुछ कहने की भी ज़रूरत नहीं होती, तथा आँखों-आँखों में ही बात हो जाती है।' विद्यार्थियों को अपने शिक्षक की बात समझ में आ गई।

हम भी हमारे रिश्तों में कम से कम फासला रखने की कोशिश करें। जब दिलों में दूरियॉं नहीं होंगी तो ना ईर्ष्या होगी और ना ही क्रोध। फिर क्यों हम किसी पर चिल्लाएँगे ? रिश्तों की मिठास को महसूस करें, ना कि क्रोध जैसी बुराईयों में अपनी शक्ति व्यर्थ नष्ट करें।

(इन्दौर के जाने माने प्रबंध-गुरू ख़ुशी बाँटने वाले नेक इंसान एस.नंद द्वारा संपादिन
परिपत्र स्वयं-उत्थान के ताज़ा अंक से और चित्र गूगल सर्च से साभार )

6 comments:

Manish said...

बहुत सही बात कही शिक्षक ने। प्रस्तुति के लिए धन्यवाद !

Ashok Pande said...

संजय भाई, बहुत कम शब्दों में बहुत गहरी बात. अपने यहां के स्कूलों को देखकर लगता है काश ऐसा हो पाता.

Udan Tashtari said...

अच्छी सीख. इस प्रस्तुति के लिए आभार.

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

बढ़िया...बढ़िया बात.

Lavanyam - Antarman said...

रिश्तों की मिठास को महसूस करें, ना कि क्रोध जैसी बुराईयों में अपनी शक्ति व्यर्थ नष्ट करें।
ऐसा ही हो सँजय भाई :)
- लावण्या

Gyandutt Pandey said...

यह तो बड़े काम की बात बताई। और बहुत तर्कसंगत भी।