Wednesday, June 25, 2008

बरखा के अभिनंदन में भीगी ये मल्हारमय बंदिश

मेवाती घराने के चश्मे-चिराग संजीव अभ्यंकर देश के उन शास्त्रीय संगीत गायकों में
से एक हैं जिन्होंने अल्पायु में अपने गुरू पं.जसराज की गायकी को आत्मसात कर
पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है. मेवाती घराने में बंदिश की ख़ूबसूरती
पर क़ायम रहते हुए गायकी के किलोल से अदभुत तेवर सिरजे जाते हैं।



संजीव की आवाज़ की मिठास जादू और उस पर मेवाती घराने की
गायकी का आसरा । सब कुछ कुछ यूँ सधता है कि हमें अपनी मशीनी जीवन शैली से कोफ़्त
सी होने लगती है.और हाँ इस गायकी की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि छोटी छोटी
तानों को बड़ी सुघड़ता से सँवारा जाता है.जैसे कोई सुन्दरी अपने प्रियतम के स्वागत
में अपनी ड्योढ़ी पर बंधनवार सजा रही हो.

थोड़ा तन्मय होकर सुनेंगे तो महसूस करेंगे कि क्लासिकल मौसिक़ी जब अपने
शबाब पर होती है तब सुनने वाला अपनी सुधबुध खो बैठता है. शास्त्र में ज़्यादा
उतरने की ज़रूरत नहीं..बस स्वर की सृष्टि के भाव-लोक में चले जाइये.....
लौटने को जी नहीं चाहेगा.विलम्बित से शुरू होकर मध्य और द्रुत लय पर
आती आती ये बंदिश कितना कुछ कह जा रही है सुनिये तो.....

ये रतजगा आपको सुरीला ही लगेगा....शर्तिया.



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10 comments:

Parul said...

tabiyat kush ho gayi sun kar...shukriyaa sanjay bhayi

Neeraj Rohilla said...

संजयजी,
शर्तिया, डूबकर रह गये इस रचना में । बहुत धन्यवाद !!!

संजीव अभ्यंकर जी का एक एल्बम मेरे पास है । अडाना में उन्होने माता काली की वंदना गायी है, यही बंदिश मेरे पास पं जसराज की आवाज में भी है । दोनो को सुनो तो लगता है जैसे गीत की आत्मा एक ही है, एक ही अंदाज, एक ही अदायगी ।

जल्दी ही सुनवाते हैं अपने चिट्ठे पर मां काली की वन्दना ।

आज ही मैने अपने चिट्ठे पर वडाली बन्धुओं की एक रचना चढाई है, नजर डालियेगा ।
http://antardhwani.blogspot.com/2008/06/blog-post_25.html

Lavanyam - Antarman said...

शाश्त्रीय सँगीत और वह भी कायदे से , पक़ड के साथ गाया हुआ हो तब उसका कोयी सानी नहीँ होता -बरखा ऋतु का आनँद दिलवाया आपने इस प्रस्तुति से - शुक्रिया !

Udan Tashtari said...

आनन्द आ गया संजय भाई. बहुत उम्दा प्रस्तुति.

Harshad Jangla said...

Sanjaybhai

Enjoyed very much.

-Harshad Jangla
Atlanta, USA

Gyandutt Pandey said...

संजीव अभ्यंकर जी का गायन तो बहुत प्रिय लगा। और सामयिक भी - वर्षा पर।
संगीत की समझ तो नहीं है, पर सुनने में कर्ण प्रिय लगा।

zara said...

संजयभाई,

बरखा ऋतु आई...
दोपहर में फुहारों के बीच सुना मैंने
आनंद आ गया जी...

कल का नईदुनिया आज देख सका.

शुभकामनाएं और बधाई...

//
आपने ब्लाॅग के कपड़े चेंज कर दिए हैं. काफी सुंदर दिख रहा है...

अवधेश प्रताप सिंह
98274 33575

दिलीप कवठेकर said...

Sanju,

What a treat, indeed!!

I was just looking for this song, as I purchased cassate 5 years back, but lost it. So, thanks again.

I could not get your write up in Nai Dunia, as I was away in Hyderabad, and it did not open in the link you senbt.

So today earliy morning, I tried again on Airport, and Got it !!

It is a proud moment, as I also remember , your early flirting with Anchorship, in Mature Amatuers.

Yah nayaa kalewar rang aur roop me acchaa hai, magar Hindi ke sabhi sabd gadbad dikh rahe hai?

I have also opened my Blog. Pl see.

Ashok Pande said...

बेशक एक संग्रहणीय प्रस्तुति संजय भाई. बहुत बहुत आभार इसे सुनवाने का. संजीव अभ्यंकर मेरे संग्रह में मौजूद हैं वैसे तो लेकिन इस प्रस्तुति की बात कुछ और ही है.

अल्पना वर्मा said...

shashtriy sangeet ki jaankari nahin hai Lekin bahut hi bahut bhaaya hai is bandish ko sunNa.
thanks Sanjay ji..is tarah ki aur bhi achchee rachnayen sunayeeyega...

classical singing'ka naam jab bhi sunte hain to sirf 'alaap 'hi dhyan aate hain--is tarah ki bandish sunna apne aap mein ek alag anubhav hai.
dhnywaad