Friday, April 25, 2008

ज़िन्दगी की सचाइयां बयान करते मुक्तक !

आज ये मुक्तक लाया हूं बुज़ुर्ग शायर जनाब एस.एन.रूपायन के मजमुए ' टुकडे़ टुकडे़ हयात 'से.

रूपायन साहब लाहौर के नामचीन एस.वी.काँलेज में पढे़ हैं और उर्दू के ऐसे शायरों में उनका ना बाइज़्ज़्त शुमार किया जा सकता है जिन्होने बहुत एकांत में रह कर ज़ुबान और अदब की ख़िदमत की है.पचास साला पुरानी किताबों की दुकान रूपायना ने इन्दौर शहर के लिट्रेचर और पुस्तक प्रेमियों को बहुत कुछ दिया है.रूपायन साहब अब अस्सी पार हैं और थक चले हैं.उनकी पत्नी श्रीमती लीला रूपायन जानी मानी कहानीकार हैं.रूपायन दंपत्ति की असली कमाई है इन्दौर के बडी़-छोटी उम्र के साहित्यप्रेमियों का स्नेह.रूपायन साहब की ज़िन्दगी का एक और पहलू है और वह यह कि वे हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गहरे जानकार हैं और आकाशवाणी के प्रतिष्ठापूर्ण दौर में आँडिशन कमेटी के गणमान्य सदस्य रहे हैं.सादा तबियत रूपायन साहब हमेशा प्रचार और प्रशस्ति से कोसों दूर रहे हैं.उर्दू साहित्य की लोकप्रिय विधा मुक्तक पर रूपायन साहब का कारनामा रेखांकित करने योग्य है.वे चार पंक्तियों में पूरी एक ग़ज़ल का मर्म अपनी बात में कहने का हुनर रखते हैं रूपायन साहब. आज पढ़िये उनके चंद मुक्तक जो ज़िन्दगी की सचाइयों को बयान कर रहे हैं .आपसे रूबरू हैं...जनाब एस.एन.रूपायन :

गै़र की बातों को छोडो़ गैर पर
दोस्तो ! खु़द से वफ़ादारी करो
जीना मुश्किल है मगर हर हाल में
हँस के जीने की अदाकारी करो.

ज़िन्दगानी की ओढ़नी पर जो
टांक रक्खे हैं हमने गुल-बूटे
फूल पत्ते ही इन को मत समझो
ये तो हैं छोटे-छोटे समझौते.

जिसकी है जैसी तमन्ना लिक्खो
और क्या उसको मिलेगा लिक्खो
जिनको आता नहीं जीने का हुनर
उनके हिस्से में निराशा लिक्खो.

टूटता हूँ न मै बिखरता हूँ
फ़ैलता हूँ फ़कत सदा बनकर
जब ज़माना मुझे सताता है
मै सिमट जाता हूँ दुआ बन कर.

रास्तों में उलझ न जाए कहीं
छोड़ कर घर को इतनी दूर न जा
नये रिश्ते तो बनते रहते हैं
जो पुराने हैं टूटने से बचा.

धूप शिद्द्त की है तो इसको मैं
सह न पाउंगा ये सवाल नहीं
लेकिन इस बात की है फ़िक्र मुझे
मेरा साया झुलस न जाए कहीं

पाप और पुण्य की लडा़ई में
कौन हारा है कौन जीत गया
सोचते सोचते यही आखि़र
ज़िन्दगी तेरा वक़्त बीत गया.

2 comments:

yunus said...

नमस्‍ते कहिएगा हमारी रूपायन साहब से । जल्‍दी ही ये मुक्‍तक डायरी के हवाले कर दिये जायेंगे ।

एक पंक्ति said...

गागर में सागर जैसा है रूपायन साहब का काम.
हमारे समय की त्रासदी ये है कि हम अपने आसपास के सितारों को रेखांकित ही नहीं करना चाहते.रूपायन साहब भी ऐसी ही साज़िश का शिकार दिखते हैं....ऐसे क़ाबिल क़लमकार को हमारे भावपूर्ण अभिवादन दीजियेगा...वे स्वस्थ रहें...सकुशल रहें